Saturday, 6 January 2018

देशी घाणी : तेल निकालने की परंपरागत तकनीक

घनश्याम डी रामावत
मौजूदा दौर में बाजार में भले ही तेल निकालने की अत्याधुनिक मशीने आ गई हैं किंतु सदियों से तेल निकालने की परम्परागत तकनीक अर्थात देशी घाणी को लेकर लोगों को भरोसा व इससे तैयार तेल को काम में लेने में जरा भी कमी नहीं आई हैं। हां! वर्तमान उच्च स्तरीय टेक्नोलोजी के जमाने में बैल के माध्यम से चलने वाली एवं परम्परागत लघु उद्योग के रूप में विख्यात ‘देशी घाणियों’ की संख्या में जरूर कमी आई हैं, किन्तु इसके माध्यम से तैयार होने वाले तेल/अन्य उत्पादों को लेकर गुणवत्ता की दृष्टि से लोगों के बेशुमार भरोसे के चलते ये आज भी मजबूती से अपने अस्तित्व को बरकरार रखे हुए हैं। देशी घाणी के रूप में परम्परागत इस लघु उद्योग को सुरेश भाई तेली जैसे लोगों से भी ताकत मिली हैं। राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में रायपुर तहसील अंतर्गत खूटियां गांव के रहने वाले सुरेश भाई पिछले करीब 15 वर्षों से इस परम्परागत तकनीक को जिंदा रखने की कवायद के तौर पर देशी घाणी लघु उद्योग से जुड़े हुए हैं। सुरेश भाई तेली की ओर से वर्तमान में देश के विभिन्न भागों में कुल 42 घाणियों का संचालन किया जा रहा हैं। राजस्थान, महाराष्ट्र व गुजरात में अनेक स्थानों पर ‘देव सेना’ देशी घाणी के नाम से यह लघु परम्परागत उद्योग संचालित हैं। सभी जगहों पर सुरेश भाई की ओर से नियुक्त कार्मिकों द्वारा सेवाएं दी जा रही हैं। इनके द्वारा सर्दी की ऋतु में नवम्बर से जनवरी तक इन घाणियों को स्थापित कर लोगों को इससे निर्मित उत्पाद सुलभ कराए जाते हैं। सुरेश भाई की घाणियों से तैयार तिली के तेल व सूखे मेवे से युक्त तिलकुटे को शुद्धता व गुणवत्ता की दृष्टि से सर्वाधिक पसंद किया जाता हैं। यहीं कारण हैं देवसेना ब्रांड के रूप में यह उद्योग अपनी मौजूदगी वर्षो से कायम किए हुए हैं। 

बेहतरीन गुणवत्ता वाला परम्परागत लघु उद्योग
देशी घाणी में बैलों से कोल्हू चलाकर तेल निकाला जाता हैं। इसे कच्ची घाणी का तेल भी कहा जाता हैं। आज के दौर में बैलों की जगह मशीनों ने ले ली हैं और अनेक स्थानों पर बैल की जगह मोटरसाईकिल से भी कच्ची घाणियां संचालित होने लगी हैं। बाजार में इस समय देशी घाणी अर्थात कच्ची घाणी के नाम से अनेक ब्रांडेड तेल उपलब्ध हैं किन्तु शुद्धता व गुणवत्ता की लिहाज से विश्वासपूर्वक कुछ भी नहीं कहा जा सकता। देशी घाणी में आंखों के सामने तेल निकाल कर दिया जाता हैं और चूंकि यह परम्परागत तकनीक/तरीका हैं, पूरी प्रक्रिया लोगों को सुखद अनुभूति का अहसास भी कराती हैं। सुरेश भाई के अनुसार वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मिशन ‘स्किल इंडिया’ व ‘मेक इन इंडिया योजना’ को सर्वाधिक पसंद करते हैं व सम्मान करते हैं। उनके अनुसार ‘देवसेना देशी घाणी उद्योग’ इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं, जिसके माध्यम से वे अनवरत तरीके न केवल देशी, शुद्ध व गुणवत्तायुक्त उत्पाद लोगों का उपलब्ध कराने का कार्य कर रहे हैं अपितु परम्परागत लघु उद्योग के रूप में देशी घाणी को जिंदा रखने/अस्तित्व बनाए रखने की कवायद में जुटे हुए हैं। ज्ञातव्य रहें, सर्दी के मौसम में तिली के तेल की सर्वाधिक खपत रहती हैं। पश्चिमी राजस्थान में विशेष रूप से बाजरे की रोटी(सोगरा), तिली का तेल व गुड़ सर्दी की खास रेसिपी हैं। बाजरी से निर्मित खींच में भी तिली का तेल प्रयुक्त होता हैं। देशी घाणी के माध्यम से तैयार सूखे मेवे से युक्त ‘तिलकुटा’ को भी लोगों द्वारा बेहद पसंद किया जाता हैं। देशी घाणी में प्रयुक्त होने वाला तिल खास तौर से उदयपुर जिला अंतर्गत ऊंझा मंडी से मंगवाया/खरीदा जाता हैं।

आयुर्वेद के अनुसार भी खास महत्व
मनुष्य के लिए ईश्वर का श्रेष्ठ वरदान हैं ‘तिल’। तिल सही मायने में शरीर को तन, मन और आत्मा के बीच संतुलन बनाकर स्वास्थ्य में सुधार करता हैं। तिल और तिली के तेल के सेवन से न केवल उपचार होता हैं बल्कि यह जीवन को लंबा और खुशहाल बनाता हैं(आयुर्वेद के अनुसार)। तिली के तेल के सेवन से वात्, पित और कफ जैसे मूल तत्वों में संतुलन बना रहता हैं व बीमारी इंसान तक नहीं पहुंचती हैं। गुणवत्ता व पोष्टिकता की दृष्टि से तिली का तेल सिर्फ देशी कच्ची घाणी(लकड़ी की घाणी) से निकला हुआ ही इस्तेमाल करना चाहिए। आयुर्वेद के अनुसार तिल एक महा औषधि हैं जो विभिन्न असाध्य रोगों से बचाव करता हैं, यहां तक कि यह मृत कोशिकाओं को जीवित करने का काम करता हैं। ऐसे में तेल की शुद्धता व गुणवत्ता के महत्व को सहज ही समझा जा सकता हैं। साथ ही इन्हें बरकरार रखने का सशक्त माध्यम ‘देशी घाणी’ की महत्ता को भी। ‘देवसेना देशी घाणी उद्योग’ के बैनर तले जोधपुर में इस समय छ: जगहों पर घाणियां संचालित हो रही हैं। कायलाना चौराहा/डऊकिया अस्पताल के निकट स्थापित देशी घाणी पर कार्य कर रहे कार्मिक नारायण गाडरी व रोशन के अनुसार सूर्यनगरी जोधपुर में उनके अलावा भगत की कोठी(रेलवे स्टेशन), जीवन ज्योति अस्पताल के पास, ट्रांसपोर्ट नगर, पाली मार्ग पर श्री हनुमान मंदिर के निकट तथा रामसागर चौराहे के पास देशी घाणियां संचालित हो रही हैं।

Tuesday, 2 January 2018

स्वास्तिक : धनात्मक ऊर्जा/सुख समृद्धि की गारंटी!

घनश्याम डी रामावत
घर का मुख्य द्वार बेहद खास होता हैं क्योंकि यहीं से हमारे घर में सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जाएं प्रवेश करती हैं। यदि घर में कोई हमेशा बीमार रहता हैं या कोई परेशानी चल रही हैं, तो इसका कारण घर के मुख्य द्वार में वास्तु दोष हो सकता हैं। इससे बचने के लिए घर के मुख्य द्वार पर स्वास्तिक का चिह्न बनाएं।

किसी भी धार्मिक कार्यक्रम में या सामान्यत: किसी भी पूजा-अर्चना में घर के मुख्य द्वार पर या बाहर की दीवार पर स्वास्तिक का निशान बनाकर स्वस्ति वाचन करते हैं। स्वास्तिक श्रीगणेश का ही प्रतीक स्वरूप हैं। किसी भी पूजन कार्य का शुभारंभ बिना स्वास्तिक के नहीं किया जा सकता। चूंकि शास्त्रों के अनुसार श्री गणेश प्रथम पूजनीय हैं, अत: स्वास्तिक का पूजन करने का अर्थ यही हैं कि हम श्रीगणेश का पूजन कर उनसे विनती करते हैं कि हमारा पूजन कार्य सफल हो। वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के मुख्य द्वार पर श्रीगणेश का चित्र या स्वास्तिक बनाने से घर में हमेशा सुख-समृद्धि बनी रहती हैं। ऐसे घर में हमेशा भगवान श्रीगणेश की कृपा रहती हैं और धन-धान्य की कमी नहीं होती। जानी मानी वास्तु पिरामिड विशेषज्ञ अर्चना प्रजापति के अनुसार स्वास्तिक धनात्मक ऊर्जा का भी प्रतीक हैं, इसे बनाने से हमारे आसपास से नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती हैं।

घर में सुख और समृद्धि के लिए यह करें
वास्तु पिरामिड विशेषज्ञ अर्चना प्रजापति के अनुसार यदि घर के सामने पेड़ या खंभा हैं, तो यह एक अशुभ संकेत हैं। इसके दुष्प्रभावों को रोकने के लिए घर के मुख्य द्वार पर रोज स्वास्तिक बनाएं। घर के मुख्य द्वार के आगे गड्ढा हैं, तो परिवार के सदस्यों का मानसिक पीड़ा से गुजरना तय हैं। इसके दुष्प्रभाव से बचने के लिए उस गड्ढे को भर दें। घर के मुख्य द्वार को हमेशा साफ-सुथरा और सुंदर रखना चाहिए, इससे घर में सुख और समृद्धि आती हैं। मुख्य द्वार पर पानी से भरा कांच का बर्तन रखें, जिसमें ताजे खशबू वाले फूल रखें। इससे घर में सकारात्मकता आएगी। पीपल, आम या अशोक के पत्तों की माला बनाकर प्रवेश द्वार पर बांधें। इससे नकारात्मकता दूर होती हैं। जब यह पत्तियां सुख जाएं तो इन्हें बदल दें। 

लक्ष्मी जी की तस्वीर लगाएं
धन लाभ के लिए प्रवेश द्वार पर लक्ष्मी जी की तस्वीर लगाएं, लेकिन इनके आस-पास जूते-चप्पल नहीं रखें। प्रवेश द्वार पर लक्ष्मी जी के पैर बनाएं, जो अंदर की तरफ जा रहें हों। इससे घर में समृद्धि आती हैं। प्रवेश द्वार पर शुभ लाभ का निशान बनाएं, इससे घर में रोग कम होते हैं।

Monday, 25 December 2017

कांग्रेस में राहुल युग की शुरूआत

घनश्याम डी रामावत
राहुल गांधी ने 16 दिसंबर 2017 को औपचारिक रूप से दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय, 24 अकबर रोड़ में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के रूप में अपना कार्यभार संभाल लिया। राहुल गांधी के एआईसीसी अध्यक्ष बनने से किसी को भी कोई आश्चर्य नहीं हुआ हैं। वर्षों पूर्व ही 125 वर्ष से भी अधिक पुरानी कांग्रेस पार्टी के अगले अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी का चुना जाना तकरीबन तय था। इसलिए 11 दिसंबर 2017 को जब कांग्रेसी नेता मुल्लापल्ली रामचंद्रन ने विधिवत रूप से इसकी घोषणा की तो यह खबर न तो चौंकाने वाली थी और न ही रोमांचित करने वाली। मुल्लापल्ली ने घोषणा की कि नामांकन के 89 प्रस्ताव दाखिल किये गये, जो सभी वैध थे। अब चूंकि मैदान में केवल एक ही उम्मीदवार राहुल गांधी थे इसलिए 19 साल से अध्यक्ष पद पर काबिज सोनिया गांधी के स्वाभाविक उत्तराधिकारी राहुल ही बने। 

राहुल गांधी का निर्विरोध रूप से चुना जाना लोकतंत्र हैं या अघोषित वंशतंत्र का उदाहरण, इस बहस को फिलहाल इसलिए भी यहीं खत्म कर दिया जाना चाहिए क्योंकि देश में कोई भी ऐसी राजनीतिक पार्टी नहीं हैं जिसमें लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाकर मुखिया चुना जाता हो। ऐसे में इस पर बहस करना पानी में लाठी भांजने जैसा ही हैं। राहुल गांधी के कांग्रेस मुखिया बन जाने के बाद देश में गंभीरता से अगर किसी बात पर विचार होना चाहिए तो इस बात पर ही कि आखिर उनके नाम के आगे कांग्रेस के अध्यक्ष पद के जुट जाने का कांग्रेस के लिए और देश की राजनीति के लिए क्या मायने हैं? यह तकनीकी सच हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष बनने से पूर्व राहुल गांधी साल 2013 से कांग्रेस के उपाध्यक्ष पद पर काबिज थे, वह एक किस्म से कांग्रेस के अघोषित मुखिया ही थे, इसलिए वह न तो अपनी पार्टी के लिए और न ही देश के लिए नई बात हैं। देश और खुद उनकी पार्टी उनकी राजनीतिक क्षमताओं से वाकिफ हैं और इस आधार पर उनको लेकर जो स्वाभाविक अनुमान लगाये जा सकते हैं, वे लगाये जा रहे हैं। लेकिन बदलाव चाहे जितना रूटीन का हो वह अपने साथ कुछ न कुछ परिवर्तन तो लेकर आता ही है। भले कांग्रेस में अघोषित रूप से राहुल गांधी की ही सुपरमेसी थी, लेकिन सब कुछ के बावजूद वह वैध नहीं थी, ऐसे में उसके फायदे भी थे और नुकसान भी। अब जबकि राहुल गांधी कांग्रेस के विधिवत मुखिया बन चुके हैं तो यह अनुमान लगाना स्वाभाविक ही नहीं बल्कि हर हालात में लाजमी हैं कि आखिर देश की राजनीति में इसका क्या असर पड़ेगा? 

औपचारिक तौर पर राहुल युग का आगाज
यह वाकई राहुल गांधी की खुद की कार्य शैली पर ही निर्भर करेगा कि औपचारिक तौर पर कांग्रेस अध्यक्ष बन जाने के बाद पार्टी में राहुल युग की शुरूआत हो गई हैं या यह भी महज एक मनोवैज्ञानिक धारणा भर हैं? निश्चित रूप से होने और होने जैसा होने में फर्क होता हैं। राहुल गांधी 16 दिसंबर के पहले तक अध्यक्ष नहीं थे किंतु अध्यक्ष से कम भी नहीं थे। सारे निर्णय उनके अनुसार ही पार्टी में लिए जाते थे किंतु चूंकि वे कांग्रेस के अध्यक्ष नहीं थे, कांग्रेस की तमाम असफलताओं का ठीकरा उनके सिर पर फूटने से रह जाता था, वहीं उनकी तमाम राजनीति धारणाओं को, मूल्यों को, भी कांग्रेस की आधिकारिक नीति या मूल्य नहीं माना जाता था। अब ऐसा नहीं होगा, क्योंकि अब राहुल गांधी जो भी कहेंगे वह औपचारिक रूप से कांग्रेस के अध्यक्ष की बात होगी। सवाल हैं जिस राहुल गांधी को देश पिछले कई सालों से देख रहा हैं, सुन रहा हैं, समझ रहा हैं और जिसके बारे में पक्ष विपक्ष की तमाम धारणाओं को भी जान रहा हैं, क्या इतना सब कुछ के बाद भी राहुल गांधी में कुछ नया जानने को बचा हैं? इस सवाल का जवाब हैं हां, बिल्कुल बचा हैं। जब तक कोई शख्स औपचारिक रूप से उस पद पर नहीं होता, जिस पद की हैसियत का अनौपचारिक रूप से वह लुत्फ ले रहा होता हैं, तब तक उसका प्रभाव या अप्रभाव भी वास्तविक नहीं सिर्फ अनुमानभर होता हैं। राहुल गांधी अभी तक अध्यक्ष जैसे थे किंतु अब वास्तव में अध्यक्ष हैं। इसलिए उनके अब के होने का असर पहले से कहीं ज्यादा प्रभावशाली और निर्णायक होगा। 

राजनीतिक लिहाज से व्यापक अर्थ/मायने
निश्चित रूप से यह देश की मौजूदा राजनीति में हस्तक्षेप करेगा और वही हस्तेक्षप कांग्रेस पार्टी के साथ समग्र राजनीति का राहुल युग होगा। सवाल हैं इस राहुल युग का देश के लिए, राजनीति के लिए, क्या अर्थ हैं? निश्चित रूप से इसके व्यापक अर्थ हैं। सबसे पहले तो राजनीति में औपचारिक रूप से राहुल युग शुरु होने का मतलब यह हैं कि कम से कम राजनीति में भाषाई विन्रमता का आगाज होगा और आक्रमक अलंकारों से मुक्ति मिलेगी। हो सकता हैं अब तक के वर्षो में राहुल गांधी की राजनीतिक गतिविधियां और उनके बयान बहुत परिपक्व राजनेता वाले न रहे हों लेकिन उनकी उपस्थिति ऐसी भी नहीं थी कि उनकी खिल्ली उड़ायी जाती। फिर भी लगातार ऐसा हुआ, लेकिन यह राहुल गांधी का निजी हौसला ही था कि उन्होंने आज तक इस सबके विरूद्ध कोई आाढामक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की हैं। यहां तक कि हाल ही संपन्न गुजरात विधानसभा चुनावों के प्रचार के दौरान भी जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी के तमाम नेता और कई बार खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उन पर टिप्पणियों को लेकर आक्रामक और बेलगाम हो जाते थे, राहुल गांधी ने अपने भाषाई नम्रता का दामन नहीं छोड़ा। वह लगातार जी और सर शब्दों से युक्त संबोधन करते रहे। राहुल गांधी नरेंद्र मोदी को मोदी जी या प्रधानमंत्री सर ही बार-बार कहते हैं। इससे एक बात तय हैं कि अगर राहुल गांधी ज्यादा कुछ भी नहीं कर सके तो भी राजनीति में फिर से एक सहज, सौम्य और विन्रम भाषा की औपचारिक वापसी तो सुनिश्चित करेंगे ही। 

राजनीतिक परिपक्वता के साथ अनगिनत उम्मीदें
राहुल गांधी ने जिस तरह गुजरात चुनाव में कांग्रेस राजनीति के कद्दावर नेता राजस्थान के पूर्व सीएम अशोक गहलोत की रणनीति के अनुरूप तीन-तीन युवा आक्रामक नेताओं के साथ तालमेल का संतुलन पेश किया, वह भी उनके भविष्य के एक सफल राजनेता होने की तरफ इशारा हैं। क्योंकि पिछले आम चुनाव में भले लगा हो कि देश से क्षेत्रीय राजनीति का बोरिया बिस्तर गोल हो रहा हैं, मगर ऐसा हैं नहीं। हकीकत यही हैं और लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह किसी हद तक जरूरी भी हैं कि राजनीति में क्षेत्रीय ताकतों की मजबूती बनी रहे यानी भविष्य की राजनीति वास्तविक रूप से गठबंधन की राजनीति होगी और राहुल गांधी ने गुजरात में गठबंधन का जो संतुलन पेश किया हैं, वह उनकी भविष्य की स्वाभाविक ताकत बन सकती हैं। इन चुनावों यानी गुजरात के विधानसभा चुनाव ने राहुल को कई मायनों में गढ़ा हैं और उनकी शाख्सित को नया मोड़ दिया हैं। ये राहुल गांधी ही हैं जिनकी सियासी सूझबूझ के चलते गुजरात के चुनाव विपक्ष की तमाम कोशिशों के बावजूद हिंदू और मुसलमानों के बीच ध्रुवीकृत नहीं हुए और कांग्रेस को गुजरात में भले ही सरकार बनाने मे कामयाबी नहीं मिली किंतु परिणाम सुखदायी रहे। गुजरात में आज पार्टी मजबूत हुई हैं तो इसका श्रेय राहुल गांधी को ही जाता हैं। गुजरात चुनाव के बाद राहुल गांधी को सोमनाथ मंदिर जाकर पूजा अर्चना करना और नेताओं के साथ हार की समीक्षा करना व आज जनता से मुखातिब होना, उनकी राजनीतिक परिपक्वता को ही परिलक्षित करता हैं। निश्चित रूप से राहुल युग न सिर्फ कांग्रेस के लिए बहुत उम्मीदों वाला हैं बल्कि देश की भी नजरें राहुल गांधी के सकारात्मक राजनीतिक हस्तक्षेप पर टिकी हुई हैं।

Sunday, 24 December 2017

रिफाइनरी : राजनीति गर्माने के संकेत

घनश्याम डी रामावत
राजस्थान के पचपदरा में प्रस्तावित रिफाइनरी को लेकर एक बार फिर राजनीति गर्माने के आसार प्रबल होते दिखाई पड़ रहे है। साल 2017 खत्म होने को हैं और अगले वर्ष में ही राजस्थान में चुनाव होने हैं। चार साल तक चुप्पी साधे बैठी रही प्रदेश की सत्तारूढ वसुंधरा सरकार ने फिर एक बार शगुफा छोड़ दिया हैं। नया एमओयू के साथ नए ढंग से उदघाटन करवाया जायेगा। ज्ञातव्य रहें, पूर्ववत्र्ती कांग्रेस सरकार भी इस रिफाइनरी का विधिवत रूप से शिलान्यास अपने समय में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहनसिंह व उस समय की कांगे्रस अध्यक्षा सोनिया गांधी से करवा चुकी हैं।

चूंकि अगले साल में चुनाव हैं, बाड़मेर के पचपदरा में एक बार फिर गतिविधियां जबरदस्त बढ़ गयी हैं। रिफाइनरी मामले में जहां तक जानकारी मिल रही हैं राजस्थान की सीएम वसुंधरा राजे ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से समय भी ले लिया हैं। इस बात का संकेत पिछले दिनों प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अशोक परनामी अपनी जोधपुर यात्रा के दौरान स्वयं दे चुके हैं। दरअसल पिछले चार वर्षों से रिफाइनरी का मामला पूरी तरह से ठंडे बस्ते में ही था। इसका वापस अब एमओयू हुआ हैं। अगस्त 2017 में पैट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड एचपीसीएल के साथ नया एमओयू किया गया हैं जबकि राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा आईओसीएल के साथ एमओयू किया गया था। सूबे की कांग्रेस पार्टी का आरोप हैं कि एमओयू सार्वजनिक नही किया गया। ये प्रोजेक्ट विलंब से शुरू करने के कारण प्रदेश को करोड़ों रूपयों का नुकसान हुआ हैं। कांग्रेस के अनुसार रिफाइनरी युवाओं के लिए रोजगार को सशक्त जरिया था, विलंब से युवा रोजगार से वंचित  रहे। 43 हजार करोड़ की अनुमानित लागत का ये प्रोजेक्ट राजस्थान सरकार और एचपीसीएल के बीच अगस्त में हुए एमओयू के तहत शुरू किया जायेगा। रिफाइनरी की लागत अब 43.129 करोड़ रुपए तक पहुंच चुकी हैं और तय समझौते के मुताबिक इसकी दरें आयेगी। वहीं संयुक्त रूप से कंपनी का नाम एचपीसीएल राजस्थान रिफाइनरी लिमिटेड होगा। जिसमें एचपीसीएल की 74 प्रतिशत और राजस्थान सरकार की 26 प्रतिशत हिस्सेदारी होगी।

स्थानीय युवाओं को रोजगार देने में सहायता मिलेगी
ये रिफाइनरी पर्यावरण  अनुकूल प्रौद्योगिकी के तहत लगायी जा रही हैं। जिसमें भारत मानक 6 दर्जे के पैट्रोलियम उत्पादों को तैयार करने वाली देश की ये पहली रिफाईनरी होगी। दरअसल 2014 में लोकसभा चुनावों के दौरान बीजेपी नेता नरेन्द्र मोदी(वर्तमान पीएम) की ओर से चुनाव प्रचार के दौरान रिफाइनरी लगाने के साथ ही पैट्रोलियम इंस्टीटूयट की स्थापना की बात जोर शोर से कही गई थी। यह वाकई आश्चर्यजनक हैं कि मौजूदा राजस्थान सरकार की ओर से इस मामले में अपेक्षित ठोस/त्वरित कार्यवाही अभी तक नजर नहीं आई हैं। समीक्षकों की माने तो यहां पर रिफाईनरी लगने से आईटीआई और कौशल विकास केंद्रों के माध्यम से स्थानीय युवाओं को रोजगार देने में सहायता मिलेगी। पचपदरा/राजस्थान में रिफाइनरी लगने राजस्थान पैट्रोलियम सहायक उद्योगों के हब बनने से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से रोजगार के अनेक अवसर पैदा होंगे।

कचरे से बिजली का उत्पादन

घनश्याम डी रामावत
जोधपुर नगर निगम राजस्थान का पहला ऐसा निकाय संस्थान हैं जो कचरे से बिजली का उत्पादन करने जा रहा हैं। स्वच्छ भारत अभियान के तहत वेस्ट टू एनर्जी प्रोजेक्ट के अंतर्गत जोधपुर निगम इस प्रोजेक्ट की शुरूआत करने जा रहा हैं। इस प्रोजेक्ट में करीब 100 करोड़ रूपए की लागत आएगी जिसको लेकर निजी कंपनी को लैंड भी अलोट कर दी गई हैं अब सरकार के स्तर पर एक एमओयू होना बाकी हैं उसके होते ही इस प्रोजेक्ट पर काम होना शुरू हो जाएगा। नगर निगम की माने तो इससे प्रतिदिन 103 मेघावाट की बिजली तैयार होगी। 

जोधपुर नगर निगम की ओर से कचरे से बिजली बनाने की कवायद अंतर्गत 100 करोड़ के टेंडर कर दिए गए हैं और इस पर काम शुरू होना हैं। कचरे से बिजली निर्माण की पहल के तहत संबंधित लागत का प्रोजेक्ट बनाने के साथ ही भूमि का आवंटन कर दिया गया हैं। प्रोजेक्ट शुरू होने के बाद 103 मेगावाट बिजली प्रतिदिन तैयार होगी। इस प्रोजेक्ट को लेकर सरकार स्तर पर एमओयू होना बाकी रहा हैं जिसके बाद इसका कार्य विधिवत रूप से शुरू हो जाएगा। ज्ञातव्य रहें, जोधपुर महानगर में प्रतिदिन 600 टन कचरा एकत्रित होता हैं, इसी कचरे से 103 मेघावाट बिजली तैयार किए जाने की योजना नगर निगम द्वारा प्लान की गई हैं। महापौर घनश्याम ओझा लगातार इसके लिए मॉनिटरिंग कर रहे हैं। ओझा की माने तो वेस्ट टू एनर्जी प्रोजेक्ट के तहत जो 600 टन कचरा निकलता हैं उससे करीब 103 मेघावाट बिजली बनेगी जिसके तहत 100 करोड़ रूपए का प्रोजेक्ट हैं और पार्टी को लेंड अलोट कर दिया गया हैं और पार्टी की ओर से 5 करोड़ की बैंक आरटी भी जमा करा दी गई हैं। अब सरकारी स्तर पर जो एमओयू अटका हुआ हैं उसके होने के बाद इसका काम शुरू कर दिया जाएगा।

बिजली के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास 
नगर निगम के अनुसार राजस्थान सरकार जिस तरह पूरे प्रदेश को बिजली के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के प्रयास कर रही है उन्हीं प्रयासों को अमली जामा पहनाने के लिए जोधपुर नगर निगम की ओर से यह सारी कवायद हैं। नगर निगम द्वारा इस योजना को लेकर पिछले कई सालों से कार्य किया जा रहा हैं और स्वच्छ भारत मिशन के तहत कचरे से बिजली उत्पादन की योजना लागू करने वाला जोधपुर निगम प्रदेश का पहला शहर हैं। इससे कचरा नियमित उठेगा, निस्तारण होगा और बिजली भी बनेगी।

Wednesday, 20 December 2017

मौली (कलावा) : धार्मिक आस्था का प्रतीक/वैदिक रक्षा सूत्र

घनश्याम डी रामावत
मौली बांधना वैदिक परंपरा का हिस्सा हैं। यज्ञ के दौरान इसे बांधे जाने की परंपरा तो पहले से ही रही हैं लेकिन इसको संकल्प सूत्र के साथ ही रक्षा-सूत्र के रूप में तब से बांधा जाने लगा, जबसे असुरों के दानवीर राजा बलि की अमरता के लिए भगवान वामन ने उनकी कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधा था। इसे रक्षाबंधन का भी प्रतीक माना जाता हैं, जबकि देवी लक्ष्मी ने राजा बलि के हाथों में अपने पति की रक्षा के लिए यह बंधन बांधा था। मौली को हर हिन्दू बांधता हैं। इसे मूलत: रक्षा सूत्र कहते हैं।

मौली का शाब्दिक अर्थ व बांधने के स्थान
पश्चिमी राजस्थान के आदिवासी अंचल से संबद्ध नाणा (पाली) क्षेत्र के जाने माने ज्योतिषविद् पण्डित दिलीप 
महाराज के अनुसार ‘मौली’ का शाब्दिक अर्थ हैं ‘सबसे ऊपर’। मौली का तात्पर्य सिर से भी हैं। मौली को कलाई में बांधने के कारण इसे कलावा भी कहते हैं। इसका वैदिक नाम उप मणिबंध भी हैं। मौली के भी प्रकार हैं। शंकर भगवान के सिर पर चन्द्रमा विराजमान हैं इसीलिए उन्हें चंद्रमौली भी कहा जाता हैं। मौली कच्चे धागे (सूत) से बनाई जाती हैं जिसमें मूलत: तीन रंग के धागे होते हैं-लाल, पीला और हरा, लेकिन कभी-कभी यह पांच धागों की भी बनती हैं जिसमें नीला और सफेद भी होता हैं। तीन और पांच का अर्थ कभी त्रिदेव के नाम की, तो कभी पंचदेव। मौली को हाथ की कलाई, गले और कमर में बांधा जाता हैं। इसके अलावा मन्नत के लिए किसी देवी-देवता के स्थान पर भी बांधा जाता है और जब मन्नत पूरी हो जाती हैं तो इसे खोल दिया जाता हैं। इसे घर में लाई गई नई वस्तु को भी बांधा जाता और इसे पशुओं को भी बांधा जाता हैं। 

आध्यात्मिक दृष्टि से कुछ सावधानियां जरूरी
शास्त्रों के अनुसार पुरुषों एवं अविवाहित कन्याओं को दाएं हाथ में कलावा बांधना चाहिए। विवाहित स्त्रियों के लिए बाएं हाथ में कलावा बांधने का नियम है। ज्योतिषविद् पण्डित दिलीप महाराज के अनुसार कलावा बंधवाते समय जिस हाथ में कलावा बंधवा रहे हों, उसकी मुट्ठी बंधी होनी चाहिए और दूसरा हाथ सिर पर होना चाहिए। मौली कहीं पर भी बांधें, एक बात का हमेशा ध्यान रहे कि इस सूत्र को केवल तीन बार ही लपेटना चाहिए व इसके बांधने में वैदिक विधि का प्रयोग करना चाहिए। दिलीप महाराज के अनुसार पर्व-त्योहार के अलावा किसी अन्य दिन कलावा बांधने के लिए मंगलवार और शनिवार का दिन शुभ माना जाता हैं। हर मंगलवार और शनिवार को पुरानी मौली को उतारकर नई मौली बांधना उचित माना गया हैं। उतारी हुई पुरानी मौली को पीपल के वृक्ष के पास रख दें या किसी बहते हुए जल में बहा दें। प्रतिवर्ष की संक्रांति के दिन, यज्ञ की शुरुआत में, कोई इच्छित कार्य के प्रारंभ में, मांगलिक कार्य, विवाह आदि हिन्दू संस्कारों के दौरान मौली बांधी जाती हैं।

धार्मिक आस्था का प्रतीक हैं ‘मौली’
मौली को धार्मिक आस्था का प्रतीक माना जाता है। किसी अच्छे कार्य की शुरुआत में संकल्प के लिए भी बांधते हैं। किसी देवी या देवता के मंदिर में मन्नत के लिए भी बांधते हैं। मौली बांधने के तीन कारण हैं-पहला आध्यात्मिक, दूसरा चिकित्सीय और तीसरा मनोवैज्ञानिक। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करते समय या नई वस्तु खरीदने पर हम उसे मौली बांधते हैं ताकि वह हमारे जीवन में शुभता प्रदान करे। हिन्दू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कर्म यानी पूजा-पाठ, उद्घाटन, यज्ञ, हवन, संस्कार आदि के पूर्व पुरोहितों द्वारा यजमान के दाएं हाथ में मौली बांधी जाती है। इसके अलावा पालतू पशुओं में हमारे गाय, बैल और भैंस को भी पड़वा, गोवर्धन और होली के दिन मौली बांधी जाती है। मौली को कलाई में बांधने पर कलावा या उप मणिबंध करते हैं। हाथ के मूल में तीन रेखाएं होती हैं जिनको मणिबंध कहते हैं। भाग्य व जीवनरेखा का उद्गम स्थल भी मणिबंध ही है। इन तीनों रेखाओं में दैहिक, दैविक व भौतिक जैसे त्रिविध तापों को देने व मुक्त करने की शक्ति रहती है।

‘मौली’ बंधन पश्चात आसुरी शक्तियां बेअसर
मणिबंधों के नाम शिव, विष्णु व ब्रह्मा हैं। इसी तरह शक्ति, लक्ष्मी व सरस्वती का भी यहां साक्षात वास रहता है। जब हम कलावा का मंत्र रक्षा हेतु पढक़र कलाई में बांधते हैं तो यह तीन धागों का सूत्र त्रिदेवों व त्रिशक्तियों को समर्पित हो जाता है जिससे रक्षा-सूत्र धारण करने वाले प्राणी की सब प्रकार से रक्षा होती है। इस रक्षा-सूत्र को संकल्पपूर्वक बांधने से व्यक्ति पर मारण, मोहन, विद्वेषण, उच्चाटन, भूत-प्रेत और जादू-टोने का असर नहीं होता। आध्यात्मिक लिहाज से अर्थात शास्त्रों का ऐसा मत हैं कि मौली बांधने से त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु व महेश तथा तीनों देवियों-लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती की कृपा प्राप्त होती हैं। ब्रह्मा की कृपा से कीर्ति, विष्णु की कृपा से रक्षा तथा शिव की कृपा से दुर्गुणों का नाश होता हैं। इसी प्रकार लक्ष्मी से धन, दुर्गा से शक्ति एवं सरस्वती की कृपा से बुद्धि प्राप्त होती हैं। यह मौली किसी देवी या देवता के नाम पर भी बांधी जाती हैं जिससे संकटों और विपत्तियों से व्यक्ति की रक्षा होती हैं। यह मंदिरों में मन्नत के लिए भी बांधी जाती हैं।

धार्मिक/चिकित्सकीय दृष्टि से खास महत्व
इसमें संकल्प निहित होता है। मौली बांधकर किए गए संकल्प का उल्लंघन करना अनुचित और संकट में डालने वाला सिद्ध हो सकता हैं। यदि आपने किसी देवी या देवता के नाम की यह मौली बांधी हैं तो उसकी पवित्रता का ध्यान रखना भी जरूरी हो जाता हैं। कमर पर बांधी गई मौली के संबंध में विद्वान लोग कहते हैं कि इससे सूक्ष्म शरीर स्थिर रहता हैं। बच्चों को अक्सर कमर में मौली बांधी जाती हैं। यह काला धागा भी होता हैं। इससे पेट में किसी भी प्रकार के रोग नहीं होते। प्राचीनकाल से ही कलाई, पैर, कमर और गले में भी मौली बांधे जाने की परंपरा के चिकित्सीय लाभ भी हैं। शरीर विज्ञान के अनुसार इससे त्रिदोष अर्थात वात, पित्त और कफ का संतुलन बना रहता है। पुराने वैद्य और घर-परिवार के बुजुर्ग लोग हाथ, कमर, गले व पैर के अंगूठे में मौली का उपयोग करते थे, जो शरीर के लिए लाभकारी था। ब्लड प्रेशर, हार्टअटैक, डायबिटीज और लकवा जैसे रोगों से बचाव के लिए मौली बांधना हितकर बताया गया है।

‘मौली’ बांधने के मनोवैज्ञानिक लाभ
शरीर की संरचना का प्रमुख नियंत्रण हाथ की कलाई में होता हैं अत: यहां मौली बांधने से व्यक्ति स्वस्थ रहता हैं। उसकी ऊर्जा का ज्यादा क्षय नहीं होता हैं। शरीर विज्ञान के अनुसार शरीर के कई प्रमुख अंगों तक पहुंचने वाली नसें कलाई से होकर गुजरती हैं। कलाई पर कलावा बांधने से इन नसों की क्रिया नियंत्रित रहती हैं। कमर पर बांधी गई मौली के संबंध में विद्वान लोग कहते हैं कि इससे सूक्ष्म शरीर स्थिर रहता है और कोई दूसरी बुरी आत्मा आपके शरीर में प्रवेश नहीं कर सकती हैं। बच्चों को अक्सर कमर में मौली बांधी जाती हैं। यह काला धागा भी होता हैं। इससे पेट में किसी भी प्रकार के रोग नहीं होते। मौली बांधने से उसके पवित्र और शक्तिशाली बंधन होने का अहसास होता रहता हैं और इससे मन में शांति और पवित्रता बनी रहती हैं। व्यक्ति के मन और मस्तिष्क में बुरे विचार नहीं आते और वह गलत रास्तों पर नहीं भटकता हैं। कई मौकों पर इससे व्यक्ति गलत कार्य करने से बच जाता हैं।

Tuesday, 19 December 2017

2017 अलविदा कह देने को सज्ज, बेरोजगारी यथावत

घनश्याम डी रामावत
वर्ष 2017 खत्म होते-होते भी सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार की झोली में ढ़ेरों खुशियां डाल गया। गुजरात व हिमाचल प्रदेश में भाजपा की जीत से न केवल इन दोनों प्रदेशों में पार्टी की सरकार बनेगी, राजग भी पहले से अधिक मजबूत हुआ हैं। राजग इस विजय को अपनी सरकार द्वारा लिए गए विभिन्न फैसलों पर जनता का निर्णय मान रही हैं। इन सबके बीच कोई नाखुश हैं तो वह हैं देश का युवा वर्ग। सही मायने में युवा वर्ग के लिए वर्ष 2017 अच्छा नहीं रहा। पूरा वर्ष बेराजगारी मुंह चिढ़ाती रही और युवा सरकार की ओर से रोजगार के विकल्पों का इंतजार करता रहा। यह इन्तजार बस इन्तजार ही रह गया। साल 2017 बीतने में महज चंद दिन शेष हैं और वह पूरी तैयारी के साथ अलविदा कह देने को सज्ज हैं।

मौजूदा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(राजग) सरकार के साढ़े तीन साल बाद भी तरक्की के उपलब्ध आंकड़ों में सबसे खराब प्रदर्शन रोजगार और नौकरियों के क्षेत्र में ही हैं। नोटबंदी और जीएसटी के बाद नौकरियां गंवाने वालों के आंकड़े ने इस धधकती आग में घी डालने का काम किया, तो कई निजी क्षेत्रों में छंटनी भी हुई और आईटी सेक्टर से लेकर कारखानों तक पर आटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंसी का नकारात्मक असर पड़ा। अमेरिकी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने जीडीपी, नोटबंदी, बैंक के फंसे कर्ज को लेकर उठाए गए कदमों, आधार कार्ड और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर को भले ही उल्लेखनीय कदम बताया हो, लेकिन रोजगार सृजन करने और युवाओं को नौकरियां देने के मामले में पिछड़ेपन पर बना सवाल दिन-प्रतिदिन गहराता ही जा रहा हैं। कुल मिलाकर इसे यूं भी कह सकते हैं कि विकास और आर्थिक प्रगति के तमाम दावों के बावजूद रोजगार का परिदृश्य और भविष्य धुंधला बना हुआ हैं। 

बढ़ती ही जा रही हैं बेरोजगारी दर
बेरोजगारी दर बढ़ती ही जा रही हैं। एक आंकलन के अनुसार रोजाना सैंकड़ों की संख्या में नौकरियां गायब हो रही हैं या फिर इनका चोला तेजी से बदल रहा हैं। इस बावत केन्द्र में सत्तारूढ़ राजग सरकार के ही सालाना सर्वेक्षण के अध्ययन अच्छी तस्वीर नहीं पेश कर रहे हैं। केंद्र में सत्ता संभालने के बाद रोजगार को लेकर अपनी तरह का पहला सर्वेक्षण 2016 में करवाया गया था। उस क्रम में पाया गया कि देश के 68 प्रतिशत घरों की मासिक आय 10 हजार रुपये हैं। इस सर्वेक्षण से यह भी पता चला कि शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में बेरोगारी अधिक हैं। 42 फीसदी कामगारों को 12 महीने काम नहीं मिलता हैं। महिलाओं की बेरोजगारी दर 8.7 प्रतिशत पर पहुंच गई हैं। चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों के लिए लाखों में मिलने वाले शिक्षित बेरोजगारों के आवेदन नौकरी की कमी को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। यह स्पष्ट हैं कि सरकार के तमाम दावों, चाहे फिर वो मेक इन इंडिया हो या फिर स्टार्ट अप इंडिया अथवा स्वरोजगार के लिए मुद्रा बैंक की योजनाओं के जरिए रोजगार के नए अवसर पैदा करने के दावे, इस सबके बाद भी हालात जस के तस हैं। 

रोजगार वाले वादे पूरे हो पाएंगे संशय
सरकार की कोई भी ऐसी योजना नहीं हैं जिसने नौकरियां पैदा करने के अपने लक्ष्य को पूरा किया हो। हर दावा फेल हो चुका है। इसे देखते हुए अब कोई यह नहीं कह सकता कि लोकसभा चुनाव में हर साल दो करोड़ रोजगार वाले भाजपा के वादे पूरे हो पाएंगे। इसकी कई वजहों में पहली वजह हर किसी में सरकारी नौकरी की ख्वाहिश भी हैं। दूसरा कारण निजी नौकरियों में असुरक्षा, पारिवारिक-सामाजिक दायरे में अस्तित्व को लेकर कायम सवाल और कम वेतन की समस्या का भी हं। तीसरी वजह वैसे बेरोजगारों के संदर्भ में हैं, जिन्होंने महंगी और लंबे समय तक पढ़ाई कर प्रोफेशनल डिग्रियां हासिल की हैं। बीसीए, एमसीए, बीटेक, एमटेक या अन्य कोर्स करने वालों के पास डिग्रियां हैं, लेकिन उन्हें मनमाफिक नौकरियां नहीं मिल रही हैं। वैसे यह भी सच हैं कि अधिकतर डिग्रीधारियों में काबिलियत की कमी पाई गई हैं। एक रिसर्च के अनुसार देश के 80 फीसदी इंजीनियर नौकरी के काबिल नहीं पाए गए हैं। दूसरी तरफ आज के उद्योग जगत को इंजीनियर और मैनेजर से अधिक टेक्नीशियन, मैकेनिक और कुशल कारीगरों की जरूरत होती हैं। 

नौकरियां सृजन के लिए पारदर्शिता में कमी
मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के लिए बड़ी संख्या में स्किल्ड लोगों की जरूरत हैं, जो आईटीआई जैसे संस्थानों से मिलते हैं। उनमें जरूरत के अनुरूप कुशलता की कमी होने के कारण दो-तीन साल की पढ़ाई के बाद भी उन्हें वैसी नौकरी नहीं मिल पा रही हैं, डिग्री के हिसाब से वे जिसके हकदार हैं। इस संबंध में यह विरोधाभास भी हैं कि एक ओर उद्योग को कुशल कामगार नहीं मिल रहे हैं, दूसरी तरफ अनेक सेक्टर ऐसे भी हैं, जहां कुशल कारीगर तेजी से नौकरियां खो रहे हैं। ऐसा कार्यक्षेत्र में आए बदलाव और आधुनिकता के अनुरूप कामगारों के प्रशिक्षण में कमी का नतीजा हैं। रोजगार की कमी की इनसे अलग एक और महत्वपूर्ण वजह कंपनियों व सरकारों द्वारा नए क्षेत्रों में नौकरियां सृजन के लिए वैश्विक जगह बनाने और पारदर्शिता लाने में कमी की भी हैं। इसके लिए बहुपयोगी डिजीटल इंडिया को गति देने वाले मुख्य आधार इंटरनेट की गति और उसकी अत्यधिक पहुंच बनाने में भी काफी मशक्कत करनी पड़ रही हैं। आज जबकि चीन के पास 70 करोड़ इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं और वह अमेरिका, यूरोपीय संघ और जापान तीनों के सम्मिलित आंकड़ों से भी ऊपर हैं, तो उसने डिजिटल और ई-कॉमर्स कारोबार मॉडल को बाखूबी अपना लिया हैं। 

‘इंटरनेट ऑफ थिंग्स’ को समझना जरूरी
ई-कॉमर्स और डिजिटल कंपनियों ने चीन में लाखों रोजगार उत्पन्न किए हैं। उसने पारंपरिक रोजगार के नुकसान की भरपाई इन्हीं से की हैं। पुराने रोजगार कम होने की अपेक्षा नए रोजगार बढ़े हैं। डिजिटल महशक्तियों में अमेरिका के साथ चीन का नाम आता हैं। इनसे बनने वाले रोजगार के अवसरों और ‘इंटरनेट ऑफ थिंग्स’ की उपयोगिता को न तो सरकार सही तरह से समझ पा रही हैं और न ही हमारे राजनेता। अर्थशास्त्र के जानकार भी इसे लेकर किसी खास नतीजे पर नहीं पहुंच रहे हैं। इस संदर्भ में यह सवाल सभी से पूछा जाना लाजमी हैं कि हमने अपने इंटरनेट के क्षेत्र में ऐसा क्यों नहीं किया? यहां गूगल और फेसबुक कारोबार कर रहा हैं और हमारी सरकार इसके समकक्ष तकनीक विकसित करने और रोजगार मुहैया करवाने में क्यों पिछड़ रही हैं? हमारा देसी कारोबार विदेशी फंडिंग पर क्यों निर्भर हैं? रोजगार में कमी आने का एक और कारण आईटी कंपनियों के उन्नत तकनीक में निवेश की अनिच्छा हैं। भारत की ऐसी कंपनियां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंसी या डाटा एनालिटिक्स में अहम भूमिका नहीं निभा पर रही हैं। इनके पास ऐसी प्रतिभाओं और पूंजी की कमी हैं, जिस कारण नयी डिजिटल अर्थव्यवस्था में हम बहुत तेजी से पिछड़ रहे हैं। 

गंभीरता से चिंतन मनन की जरूरत
साल 2017 ने हमें ये तमाम चीजें बहुत स्पष्टता से बतायी हैं। बहरहाल! अब भी कुछ नहीं हुआ हैं, सत्तारूढ़ सरकार को युवाओं के भविष्य के बारे में गंभीरता से चिंतन मनन की आवश्यकता हैं। रोजगार सृजन आज की पहली प्राथमिकता हैं जिसे सरकार की ओर से विकसित किया जाना अत्यंत जरूरी हैं। युवाओं के चेहरों पर खुशी लाने का यहीं एक मात्र उपाय हैं। सरकार यदि अब भी इस मामले में सजग नहीं होती हैं तो आने वाले समय में फिर उसे इसके दुष्परिणाम भुगतने के लिए भी तैयार रहना होगा।