Saturday, 5 December 2015

ओम बन्ना का थान: मोटर साईकिल के समक्ष पीड़ाओं का इजहार

घनश्याम डी रामावत
फूल मालाओं से लदी एक मोटरसाईकिल और उसके पास रखी एक तस्वीर के सामने जल रही सुगंधित धूप अगरबत्तियों के बीच नारियल की ज्योत प्रज्जवलित कर अपना मस्तक झुकाकर अपनी पीड़ाओं का इजहार करते/मन्नत मांगते लोगों का भारी जमावड़ा.. सचमुच! श्रद्धा व आस्था के अद्भुत मिश्रण के साथ अत्यधिक रोमांचकारी और कोतुहलभरा दृश्य। एक साथ अनगिनत जिज्ञासाओं का जन्म और अनेक सवालों का खड़ा हो जाना लाजमी। जी हां! मैं बात कर रहा हूं, जोधपुर-अहमदाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित ‘ओम बन्ना का थान’ धार्मिक स्थल की। एक ऐसा स्थान जो पौराणिक दृष्टि अथवा वेद-पुराणों के अनुसार निर्धारित किसी देवता अथवा देवी का नहीं हैं, अपितु एक ऐसी शख्सियत का हैं जिसकी करीब दो दशक पूर्व इसी स्थान पर दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। जोधपुर से पाली जाते वक्त पाली से लगभग 20 किमी पहले रोहट पुलिस थाने का ‘दुर्घटना संभावित’ क्षेत्र का बोर्ड लगा नजर आता हैं और उससे कुछ दूर पहुंचते ही सडक़ के किनारे वीरान स्थान पर लगभग 30 से 40 प्रसाद/पूजा अर्चना के सामान से सजी दुकानें दिखाई देती हैं और यहीं पर नजर आता हैं भीड़ से घिरा एक चबूतरा जिस पर एक बड़ी सी फोटो लगी हुई और हर वक्त जल रही ज्योत.. चबूतरे के पास ही नजर आती हैं एक फूल मालाओं से लदी बुलेट मोटर साईकिल।
अपने जिज्ञासा को शांत करने हेतु शीघ्र ही मैंने वहां मौजूद लोगों से संपर्क साधना शुरू किया तो ज्ञात हुआ कि करीब 27 वर्ष पूर्व पाली जिले के निकटवर्ती चोटिला गांव(रोहट तहसील) के ठाकुर जोग सिंह राठौड़ के पुत्र ओमसिंह राठौड़ का इसी स्थान पर अपनी इसी बुलेट मोटर साईकिल पर जाते हुए वर्ष 1988 में एक दुर्घटना में निधन हो गया था। स्थानीय लोगों के अनुसार इस स्थान पर हर रोज कोई न कोई वाहन दुर्घटना का शिकार हो जाया करता था। हालांकि जिस स्थान पर/पेड़ के पास ओमसिंह राठौड़ की दुर्घटना घटी वहीं पर अक्सर वाहन क्यों दुर्घटना का शिकार हो जाते थे, यह रहस्य आज भी यथावत रूप से बना हुआ हैं। इन सडक़ दुर्घटनाओं में कई लोग अपनी जान गंवा चुके थे। ओमसिंह राठौड़ की दुर्घटना में मृत्यु के बाद पुलिस अपनी कार्यवाही के तहत उनकी मोटर साईकिल(बुलेट) को पाली पुलिस थाने लेकर चली गई किन्तु अप्रत्याशित तरीके से अगले दिन सुबह मोटर साईकिल को पुलिस थाने में नहीं पाकर पुलिस थाने का पूरा स्टॉफ हैरान रह गया। आखिर तलाश करने पर मोटर साईकिल दुर्घटना स्थल पर ही पाई गई। पुलिस कर्मी एक बार फिर मोटर साईकिल को थाने लेकर गए लेकिन एक बार फिर रात वाली घटना का ही दोहरान हुआ। पुलिस थाने से रात्रि के समय मोटर साईकिल का गायब हो जाना और उसका दुर्घटना स्थल पर अपने आप पहुंच जाने के अनवरत घटनाक्रम के बाद आखिर पुलिस स्टॉफ व दिवंगत ओमसिंह राठौड़ के पिता ने इसे ओमसिंह की मृत आत्मा की इच्छा समझ इस बुलेट मोटर साईकिल को दुर्घटना स्थल/पेड़ के पास छाया की व्यवस्था कर रख दिया।

धार्मिक स्थल पर पूजा-अर्चना करने वालों का तांता
जैसा कि धार्मिक स्थल पर मौजूद/स्थानीय लोग बताते हैं.. मोटर साईकिल के दुर्घटना वाले स्थल पर स्थापित कर दिए जाने के बाद ओमसिंह राठौड़ को रात्रि में अक्सर वाहन चालको को दुर्घटना से बचाने के उपाय करते व चालकों को रात्रि में दुर्घटना से सावधान करते देखा गया। उनके अनुसार ओमसिंह दुर्घटना संभावित जगह तक पहुंचने वाले वाहन को किसी ने किसी तरीके से रोक देते अथवा संबंधित वाहन की गति को धीमे कर देते ताकि फिर कोई उनकी तरह असामयिक मौत का शिकार न बने। धीरे-धीरे इस स्थान ने एक धार्मिक स्थल का रूप ले लिया और लोग ओमसिंह राठौड़ की ‘ओम बन्ना’ के रूप में पूजा करने लगे। जैसी की मान्यता हैं, इसके बाद आज तक इस स्थान पर दुबारा कोई दुर्घटना नहीं घटी। ओमसिंह राठौड़ के देवलोक हो जाने के बाद भी उनकी आत्मा द्वारा इस तरह का नेक काम करते देख/चमत्कारिक किस्सों को सुनकर इस राजमार्ग से गुजरने वाले वाहन चालकों व धार्मिक स्थल के आसपास के लोगों में उनके प्रति आस्था व श्रद्धा बढ़ती गई। इसी के परिणामस्वरूप इस धार्मिक स्थल हर वक्त पूजा-अर्चना करने वालों का तांता लगा रहता हैं।

पीड़ा/कष्ट के निस्तारण की उम्मीद के साथ सजदा
अब तो आलम यह हैं कि लोग अपने सांसारिक जीवन से ताल्लुक रखने वाली हर पीड़ा/कष्ट के निस्तारण की उम्मीद के साथ अपनी मनचाही मुराद के पूरा हो जाने की कामना लिए यहां पहंचने लगे हैं। ‘ओम बन्ना’ की तस्वीर/उनकी मोटर साईकिल पर फूल माला अर्पित करने के साथ ही धूप/अगरबत्ती के साथ नारियल की ज्योत कर नमन करते हुए मन में मुरादों के पूरा हो जाने की उम्मीद के साथ श्रद्धालु अपने घर लौट पड़ते हैं। इस राजमार्ग से गुजरने वाला हर वाहन यहां रुक कर व धार्मिक स्थल को नमन कर ही आगे बढ़ता हैं। स्थानीय लोग ही नहीं पुलिस थाने से इस तरह मोटर साईकिल द्वारा अपना स्थान छोडक़र दुर्घटना स्थल पर पहुंच जाने की घटना के बाद पुलिसकर्मी भी आश्चर्यचकित हैं। इस घटना के 27 वर्ष बीत जाने के बाद भी पुलिसकर्मियों के जेहन में ओमसिंह राठौड़ का चमत्कार/उनके प्रति आस्था का भाव बरकरार हैं, संभवत: यहीं कारण हैं कि आज भी इस थाने में नई नियुक्ति पर आने वाला हर पुलिस कर्मी ड्यूटी ज्वाइन करने से पहले यहां दर्शन करने जरूर पहुंचता हैं।

मार्ग शीर्ष कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मेले का आयोजन
विविधताओं से भरे हमारे देश में देवताओं, इंसानों, पशुओं, पक्षियों व पेड़ों की पूजा-अर्चना तो आम बात हैं किंतु एक मोटर साईकिल पर पुष्प हार चढ़ाकर सजदा करते हुए उससे मन्नत मांगना/मन्नत के पूरी होने की उम्मीद पालना वाकई अंतर्मन को झकझौर कर रख देता हैं। किसी ने सच कहा हैं आस्था व श्रद्धा को किसी रूप में मापा/तौला अथवा परखा नहीं जा सकता.. इसका तो सीधा संबंध दिल/आत्मा से हैं, जब किसी के प्रति भरोसा जाग उठता हैं तो फिर इंसान बस उसी का होकर रह जाता हैं, ‘ओम बन्ना का थान’ धार्मिक स्थल का भी यहीं आलम हैं। संभवत: यह दिवंगत ओमसिंह राठौड़ के चमत्कारों/नेक कार्यो का ही परिणाम हैं कि इस स्थल पर प्रतिदिन सैंकड़ों की तादाद में लोग दर्शनार्थ पहुंचते हैं। धार्मिक स्थल पर प्रतिवर्ष मार्ग शीर्ष कृष्ण पक्ष की अष्टमी को दिवंगत ओमसिंह राठौड़ की पुण्य तिथि पर मेले का आयोजन होता हैं। इसको लेकर व्यवस्थाओं संबंधी संपूर्ण जिम्मेदारियों का निर्वहन दिवंगत ओमसिंह राठौड़ के परिवारजनों(चोटिला गांव) द्वारा ही किया जाता हैं। इस दिन हजारों की भीड़ के चलते माहौल पूरी तरह मेले का सा बन जाता हैं।

पुण्य तिथि से एक दिन पूर्व बकायदा धार्मिक स्थल पर भजन संध्या भी आयोजित होती हैं जिसमें जाने माने कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देते हैं। पुण्य तिथि वाले दिन धार्मिक स्थल पर आयोजित मेले में शरीक होने क्षेत्र के निर्वाचित जन-प्रतिनिधि/गणमान्य नागरिक/स्थानीय वाशिंदों के अलावा राजस्थान के विभिन्न जिलों से व गुजरात-हरियाणा से भी बड़ी तादाद में श्रद्धालु पहुंचते हैं।  

(ब्लॉगर का उद्देश्य स्थान विशेष के बारे में अवगत कराना मात्र हैं। इसमें उद्धत किया गया सब कुछ सुनी-सुनाई जानकारी के आधार पर हैं(अर्थात अंधविश्वास को बढ़ावा देना कतई मकसद नहीं हैं)। संदर्भ में विश्वास करना/अंधविश्वास मानना अध्ययन करने वालो/पाठकों के स्वविवेक पर हैं।

Friday, 4 December 2015

हजरत गरीब शाह दातार: हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक ‘ईश्वर के नेक प्रतिनिधि’

घनश्याम डी रामावत
नेक दिल इंसानों को नवाजने का ईश्वर का सचमुच अपना एक अलग ही अंदाज हैं। निश्चित रूप से खास नजर और खास मापदंड भी.. अपने नेक बंदों का चुनाव और उन्हें उचित समय पर अपनी असीम कृपा से नवाजना तो और भी अद्भुत। कई मर्तबा वह अपने इन नेक नियत बंदों पर ऐसी मेहरबानी भी कर देते हैं अर्थात उन्हें ऐसी शक्तियां प्रदान कर देते हैं कि उनमें किसी के भी जीवन में परिवर्तन/खुशहाली ला पाने का माद्दा समाहित हो जाता हैं। ईश्वर के ऐसे ही बंदे/करिश्माई व्यक्तित्व थे हजरत गरीब शाह दातार।

पश्चिमी राजस्थान के जालोर जिला अंतर्गत आहोर तहसील की भाद्राजून पं.स. के चारों और फैले ऊंचे पहाड़ी
 क्षेत्र के बीच स्थित हैं किशनगढ़ गांव। कुल एक हजार घरों वाले इस गांव में मात्र दस मकान मुसलमानों के हैं, अन्य कुम्हार, चौधरी तथा राजपुरोहित जाति के लोग यहां निवास करते हैं। सैंकड़ों वर्ष पहले हजरत गरीब शाह दातार के रूप में काले घने लम्बे बाल, दुबला-पतला बदन, मेले फटे कपड़े और बढ़ी खिचड़ी दाढ़ी वाली एक करिश्माई शख्सियत ने गांव की सरजमी पर अपने पाक कदम रखे। यह वो वक्त था जब गांव के लोग प्राकृतिक आपदाओं, अकाल की विभीषिका तथा खेती के अभाव में विपदापूर्ण संघर्ष के दिन व्यतीत कर रहे थे। लोग कभी नीले आसमान को देखते तो कभी अपने गांव की बंजर जमीन को। सचमुच गांव के लोगों की हालत बिल्कुल परकटे परिन्दें के माफिक थी जिनके लिए शायद अपने दर्द को बयां करना सम्भव ही नहीं। और अपना दुखड़ा रोए भी तो किसके सामने? हजरत गरीब शाह ने गांव के लोगों के चेहरो को देखा तो वे अत्यधिक भावुक हो उठे। गरीब शाह अपना ठिकाना किशनगढ़ को बनाना सुनिश्चित कर चुके थे।

रहमो-करम का नूर सभी पर बराबरी से बरसा
हजरत गरीब शाह दातार ने एक-एक करके लोगों की समस्याओं का अपने तरीके से निदान करना शुरू किया तो जल्दी ही सभी को उनके करिश्माई/चमत्कारी व्यक्तित्व का भान हो गया। गांव के लोग अब हजरत गरीब शाह के अनवरत चमत्कारों के किस्से एक-दूसरे को सुनाने लगे और बल्कि ईश्वर के प्रतिनिधि के तौर पर उनकी पूजा भी करने लगे। सही मायने में हजरत गरीब शाह दातार के पास जो भी पहुंचा वह बस उन्हीं का होकर रह गया। उनके पास और उनकी चौखट पर दीन-ओ-धर्म, अमीर-गरीब अथवा बड़े-छोटे के रूप में किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं था। सभी पर उनके रहमो-करम का नूर बराबरी से बरसा। तब से लेकर आज तक एक दशक से ज्यादा का समय हो गया किंतु राजा हो या रंग, हिंदू हो या मुसलमान.. जिसने भी उनकी चौखट चूमी वह खाली नहीं जाता हैं। गरीब शाह दातार के नाम से आम लोगों के दिलों में जगह बनाने वाले इस करिश्माई फकीर ने केवल मात्र किशनगढ़ गांव में ही नही अपितु जालोर जिले और कमोबेश जोधपुर संभाग में सर्वधर्म सद्भाव की एक ऐसी अनूठी मिसाल पेश की जिसका कोई सानी नहीं हैं। पूरी उम्र हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश देने वाले इस लाजवाब चमत्कारिक फकीर की स्मृति को यादगार बनाने के उद्देश्य से किशनगढ़ व आसपास के क्षेत्र के श्रद्धालुजन बाबा(हजरत गरीब शाह दातार) की चौखट पर प्रतिवर्ष जलसा(मेला) का आयोजन करते हैं।

सालाना उर्स में पहुंचते हैं छत्तीस कौम के लोग
हजरत गरीब शाह दातार की दरगाह पर सालाना रूप से मनाये जाने वाले मेले को लेकर जायरीनों में जोरदार उत्साह देखने को मिलता हैं। उर्स में शामिल होने के लिए राजस्थान के विभिन्न जिलों से बड़ी तादाद में जायरीन किशनगढ़ पहुंचते हैं और दरगाह में अपनी हाजिरी देते हैं। यहां पहुंचने वाले जायरीनों में मुसलमानों के अतिरिक्त अन्य मजहबों के लोग भी होते हैं। दीपावली के ठीक पखवाड़े बाद किशनगढ़ गांव में हर वर्ष गरीब शाह दातार क उर्स भरा जाता हैं। उर्स के दिनों में यहां के महफिल खाने में जाने माने कव्वाल अपनी कव्वालियां पेश करते हैं। इस मौके चादर चढ़ाने वालो की संख्या भी अधिक रहती हैं। अमन-चैन व खुशहाली की कामना से हजारों लोगों द्वारा सजदे में झुकाए जाने वालो मस्तकों को देखकर गरीब शाह की चौखट की तस्वीर उस वक्त देखते ही बनती हैं। सचमुच! दरगाह व इसके आसपास का पूरा इलाका धूप व अगरबत्ती की सुगंध से महक उठता हैं। यह इस पवित्र धाम/दरगाह/चौखट का ही कमाल हैं कि जो भी यहां आता हैं, अपने दु:खों/तकलीफों को भूल जाता हैं। यहां आने वाला हर इंसान जाते वक्त अपने साथ झोली में खुशियां भरकर ले जाता हैं।

बचपन से ही रूहानी दुनियां से जुड़ाव
ऐसी मान्यता हैं कि हजरत गरीब शाह दातार का मन बचपन से ही सांसारिक चीजों में नहीं लगता था और वह परिवार से हटकर अपनी एक अलग ही रूहानी दुनियां में खोये रहते थे। वह केवल मात्र जगत की सेवा को ही अपने जीवन का एक मात्र धर्म मानते थे। सैंकड़ों वर्ष पहले जब वह किशनगढ़ गांव पहुंचे तो उनका मन बस यहीं पर रम गया और वे यहीं के होकर रह गए। पूरे जीवन वे अपने भक्तों का दु:ख-दर्द दूर करने तथा उनकी झोली खुंशियों से भरने की ही दुआ मांगते रहे। उनके पास छत्तीस कौम के लोग अपनी परेशानियां लेकर पहुंचते थे। जो भी आता, वापस अपने साथ सुकून व खुंशियां लेकर लौटता। यहीं कारण हैं उनके उर्स में केवल मात्र मुसलमान श्रद्धालुओं की ही भीड़ नहीं रहती अन्य जाति-वर्गों की भी बड़ी संख्या रहती हैं। 

धर्म के नाम पर जिस तरह मौजूदा दौर में कट्टरपंथी ताकतें इंसानियत को बांटने में जुटी हैं। मंदिर, मस्जिद, चर्च व गुरूद्वारे ईश्वर की इबादत वाले पवित्र स्थान की जगह सियासी दांव-पेंच के अखाड़ों में तब्दील हो रहे हैं, यह स्थान वाकई सुकून का अहसास कराता हैं जहां सभी धर्म व मजहबों के लोग एक साथ सर्वे: भवंतु सुखिन:, सर्वे: सन्तु निरामया.. की भावना के साथ अमन, चैन, प्रेम, सद्भाव व खुशहाली के लिए सजदा व दुआ करते हैं। विभिन्न धर्मों के बीच की दूरियों को पाटने के साथ ही तमाम धार्मिक पाबंदियों का दरकिनार करते हुए इंसानियत का भाव जागृत करने वाले इस पावन/पवित्र धाम/स्थल/दरगाह को दिल से नमन।

Thursday, 3 December 2015

श्री नाकोड़ा पार्श्वनाथ: आस्था के साथ प्राचीन स्थापत्य एवं शिल्पकला कृतियों से परिपूर्ण विश्वविख्यात जैन तीर्थ

घनश्याम डी रामावत
श्वेतांबर जैन परम्परा का यह पावन तीर्थ पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर जिले में बालोतरा औद्योगिक कस्बे से महज 12 किलोमीटर दूर पर्वतीय श्रृंखलाओं के मध्य स्थित हैं। प्राकृतिक नयनाभिराम दृश्यों, प्राचीन स्थापत्य एवं शिल्पकला कृतियों के बेजोड़ नमूनों को समेटे आधुनिक साज सज्जा से परिपूर्ण विश्वविख्यात इस जैन तीर्थ ‘श्री नाकोड़ा पार्श्वनाथ’ का देश ही नहीं विश्व के धार्मिक स्थलों में अपना प्रमुख स्थान हैं। नाकोडा तीर्थ स्थल के विश्वविख्यात होने मे श्रद्धालुओं की अपार श्रद्धा/आस्था के साथ प्रमुख दो कारण हैं। पहला-श्वेताम्बर जैन समाज के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की दसवीं शताब्दी की प्राचीनतम मूर्ति का मिलना और 500-600 वर्षों पूर्व इस चमत्कारी मूर्ति का जिनालय में स्थापित होना(मुख्य मंदिर की भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा चूंकि सिन्दरी के पास नाकोड़ा ग्राम से आई थी, यह तीर्थ नाकोड़ा पार्श्वनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ) तथा दूसरा अधियक देव श्री भैरव देव की स्थापना श्री पार्श्वनाथ मंदिर के परिसर में होना(इनके देवी चमत्कारों के कारण हजारों लोग प्रतिवर्ष श्री नाकोड़ा भैरव के दर्शन करने यहां पहुंचते है और मनवांछित फल पाते हैं)। यह क्षेत्र लगभग दो हजार वर्ष से जैन आध्यात्मिक गतिविधियों का केंद्र रहा हैं।
 त्याग, बलिदान, देशभक्ति एवं शूरवीरता के लिए देश ही नहीं विश्वभर में अपना विशेष पहचान रखने वाला राजस्थान अपने यहां की बेहतरीन गंगा-जमुनी संस्कृति, कला व विभिन्न धर्म-संप्रदायों से ताल्लुक रखने वाले अनगिनत धार्मिक स्थलों के लिए भी जाना जाता हैं।  राजस्थान प्रदेश के साहित्य, शिल्प एवं स्थापत्य क्षेत्र में जैन धर्मावलंबियों का विशेष योगदान रहा हैं। सूक्ष्म शिल्पकला-कृतियों व गगनचुंबी इमारतों के रूप में राजस्थान के प्रत्येक हिस्से में अनेक जैन तीर्थ स्थल मौजूद हैं। श्री नाकोड़ा पार्श्वनाथ जैन तीर्थ भी एक ऐसा ही तीर्थ हैं जो न केवल जैन परम्परा के लोगों के लिए आस्था का प्रमुख केन्द्र हैं अपितु एक अनुकरणीय गौरव के रूप में वर्षों से राजस्थान का मस्तक शान से ऊंचा किए हुए हैं। प्राचीन वैभव, सुंदर शिल्पकला, दानदाताओं की उदारता, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, त्याग, मुनिवरों का प्रेरणा केंद्र, तपस्वियों की साधना भूमि, पुरातत्व विशेषज्ञों के लिए जिज्ञासा स्थल, जैनाचार्यों द्वारा दिए गए उपदेशों के पश्चात निर्मित अनेक जैन बिम्ब, सेकड़ों प्राचीन एवं नवनिर्मित जिन प्रतिमाओं का संग्रहालय, श्री पार्श्वनाथ प्रभु के जन्म कल्याणक मेले की पुण्य भूमि के तौर पर इस तीर्थ की दुनियाभर में अपनी विशेष पहचान हैं।

धार्मिक स्थल का प्राचीन इतिहास से गहरा संबंध
इस धार्मिक स्थल का प्राचीन इतिहास से गहरा संबंध है। श्री जैन श्वेताम्बर नाकोड़ा पार्श्वनाथ तीर्थ का प्राचीनतम उल्लेख महाभारत काल अर्थात भगवान श्री नेमिनाथ के समय/काल से प्रतीत होता हैं किन्तु आधारभूत ऐतिहासिक प्रमाण के अभाव में इसकी प्राचीनता 2000-2300 वर्ष पूर्व की मानी जा रही हैं। कहा जा सकता हैं कि श्री नाकोड़ा पार्श्वनाथ तीर्थ राजस्थान के उन प्राचीनतम जैन तीर्थो में से एक हैं जो 2000 वर्षों से भी अधिक समय से आबाद हैं एवं इस क्षेत्र की खेड़पटन एवं मेवानगर की ऐतिहासिक समृद्ध तथा सांस्कृतिक धरोहर का श्रेष्ठतम प्रतीक हैं। मेवानगर के पूर्व में वीरमपुर नगर के नाम से प्रसिद्ध था। वीरमसेन ने वीरमपुर तथा नाकोरसेन ने नाकोड़ा नगर बसाया था। आज भी बालोतरा-सिणधरी मुख्य मार्ग पर नाकोड़ा ग्राम लूनी नदी के तट पर बसा हुआ हैं, जिसके पास से ही इस तीर्थ के मूल नायक भगवान की प्रतिमा की पुन: प्रतिष्ठा तीर्थ के संस्थापक आचार्य श्री कीर्तिरत्न सुरीजी म.सा. द्वारा किए जाने का उल्लेख मिलता हैं। यद्यपि संदर्भ में प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, फिर भी कुछ प्राचीन गीतों, भजनों एवं इस बारे में जानकारी रखने वालो के अनुसार वीरमदेव एवं नाकोरसेन ने ही वीरमपुर, वीरपुर एवं नाकार नगरों की स्थापना की थी, ऐसा ज्ञात होता हैं।

अधिष्ठायक देव प्रभू भैरवनाथ की आकर्षक प्रतिमा
श्री नाकोड़ा तीर्थ में प्रमुख आराध्य देव भगवान पार्श्वनाथ मंदिर का विशाल शिखर हैं तथा आजू-बाजू दो छोटे शिखर हैं। मंदिर में मूल गंभारा, गूढ़ मंडप, सभा मंडप, नवचौकी, श्रृंगार चौकी और झरोखे बने हुए हैं जो देखने में साधारण से लगते हैं.. वास्तव में संगमरमर पाषाणों की बारीक शिल्प-कलाकृतियों से इन्हें सुसज्जित किया हुआ हैं। मंदिर में तीर्थोंद्धारक खतरगच्छ आचार्य कीर्तिरत्न सुरी म.सा. की पित्त पाषाण प्रतिमा विराजमान हैं, जिस पर संवत् 1356 का शिलालेख विद्यमान हैं। इनके ठीक सामने इस पावन तीर्थ के अधिष्ठायक देव प्रभू भैरवनाथ की मनमोहक आकर्षक प्रतिमा हैं। इन्हीं के चमत्कारों से इस तीर्थ की ख्याति वर्षों से बढ़ती चली आ रही हैं जो आज भी यथावत रूप से जारी हैं। मंदिर में निर्माण संबंधित शिलालेख सं. 1638, 1667, 1682, 1864 एवं 1865 के भी मौजूद हैं। मुख्य मंदिर के पीछे ऊंचाई पर प्रथम तीर्थंकर आदेश्वर भगवान का शिल्पकला कृतियों का खजाना लिए हुए मंदिर विद्यमान हैं। इस मंदिर का निर्माण वीरमपुर के सेठ मालाशाह की बहिन लाछीबाई ने करवाकर इसकी प्रतिष्ठा सं. 1512 में करवाई। उस समय इस मंदिर में विमलनाथ स्वामी की प्रतिमा थी, लेकिन अब मूलनायक के रूप में श्वेत पाषाण की ऋ षभदेव भगवान की प्रतिमा भी विराजमान हैं।

खंभों पर आबू व देलवाड़ा के मंदिरों की कारीगरी
श्री नाकोड़ा तीर्थ/श्री पार्श्वनाथ मंदिर के विशाल शिखर व खंभों पर विभिन्न आकृतियों की सुंदर प्रतिमाएं शिल्पकला के बेजोड़ नमूने को प्रदर्शित करती हैं। यहीं कारण हैं कि यहां आने वाले श्रद्धालु घंटों तक निहारने के बाद भी थकान महसूस नहीं करते। इसके समीप ही भारत पाक विभाजन के समय सिंधु प्रदेश के हानानगर से आई प्रतिमाओं का भव्य चौमुखा मंदिर कांच की कारीगरी का बेजोड़ नमूना हैं। इस पावन तीर्थ का तीसरा मुख्य मंदिर 16वें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथजी का हैं, जिसका निर्माण सुखमालीसी गांव के सेठ मालाशाह संखलेचा ने अपनी माता की इच्छा पर करवाया। मंदिर के खंभों पर आबू व देलवाड़ा के मंदिरों की कारीगरी परिलक्षित होती हैं। सूरजपोल में प्रवेश करते ही बाईं ओर सफेद संगमरमर की बारीक नक्काशीदार सीढिय़ों से मंदिर का मुख्य मार्ग हैं तथा मंदिर के मुख्य मार्ग पर कलात्मक पटवों की हवेली जैसलमेर जैसे झरोखे बनाए हुए हैं। इस मंदिर की प्रतिष्ठा वि.स. 1518 में गुरुदेव श्री जिनदत्त सूरी म.सा. ने एक बड़े महोत्सव में करवाई। मंदिर के प्रवेश द्वार बारीक नक्काशीदार के ठीक ऊपर श्रृंगार चौकी बनी हुई हैं जहां पीत पाषाण से निर्मित देव पुतलिकाएं विभिन्न वाद्य यंत्रों, नृत्य मुद्राओं के साथ संगीतमय उत्सव की झांकी प्रस्तुत करती हैं।

भगवान श्री शांतिनाथ के 12 भवों को कलात्मक चित्रण
नवचौकी के नीचे ही एक पीत पाषाण पर बारीकी कलाकृतियों के बीच लक्ष्मीदेवी की मूर्ति उत्कीर्ण हैं। मूल गंभारे के बाईं ओर गोखले(आलेय) में दादा जिनदत्त सूरी जी विराजमान हैं, जिनकी निश्रा में इस मंदिर की प्रतिष्ठा हुई थी। यशस्वी गुरुदेव के पावन पगलिये बाईं ओर के गोखले में सफेद संगमरमर पर स्वर्ण निर्मित हैं। इन प्रतिमाओं एवं पगलियों की प्रतिष्ठा 2008 में दादा जिनदत्त सूरी जी म.सा. ने करवाई थी। मंदिर के पिछवाड़े में श्रीपाल मेयनासुंदरी भव्य अनुपम चौमुखा मंदिर हैं। इसके आगे चलने पर श्रृंखलाबद्ध खंभों की कतार के मध्य विविध चित्रों के माध्यम से भगवान श्री शांतिनाथ के बारह भवों को कलात्मक चित्रों के जरिये उल्लेखित किया गया हैं। सूरजपोल के बाहर एक ओर महावीर स्मृति भवन स्थित हैं। वर्ष 1975 में भगवान श्री महावीर स्वामी का 2500वां निर्वाण महोत्सव मनाया गया था तब ट्रस्ट मंडल द्वारा इस भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था। इसके भीतर श्री महावीर स्वामी की आदमकद प्रतिमा विराजमान हैं। यहां आधुनिक भवन निर्माण कला और सुसज्जित विशाल एक हॉल में आकर्षक चित्रों के माध्यम से भगवान श्री महावीर स्वामी के जीवन काल की घटनाओं का चित्रण किया गया हैं।

संगमरमर के पाषाण का कलात्मक तोरण द्वार
सूरजपोल के ठीक सामने टेकरी पर पूर्व की ओर दादा श्री जिनदत्त सूरी जी म.सा. की दादावाड़ी हैं। दादावाड़ी की सीढय़ों पर चढऩे से पूर्व सफेद संगमरमर के पाषाण का कलात्मक तोरण द्वार हैं जिसे शिल्पकारों ने अपने अथक कला एवं श्रम से सजाया एवं संवारा हैं। दादावाड़ी में श्री जिनदत्त सूरी जी, मणिधारी श्री जिनचंद्रसूरी जी, श्री जिनकुशल सूरीजी व युगप्रधान श्री चंद्र सूरी जी के छोटे चरण प्रतिष्ठित हैं। दादावाड़ी से नीचे उतरते समय एक ओर सफेद संगमरमर का श्रृंखलाबद्ध भव्य नवनिर्मित मंगल कलश दिखाई देता हैं। दादावाड़ी के पीछे आचार्य लक्ष्मी सूरी जी का भव्य सफेद संगमरमर का बना गुरु मंदिर श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र हैं। मुख्य मंदिर के पीछे 1200 फीट की ऊंची पहाड़ी पर सफेद रंग की आभा से सुशोभित श्री जिन कुशल सूरी जी की दादावाड़ी स्थित हैं। तीर्थ के विकास में आचार्य हिमाचल सूरी जी एवं आचार्य जिन कांति सागर सूरिश्वर जी म.सा. के सहयोग को भुलाया नहीं जा सकता। मुख्य मंदिर के समीप सफेद संगमरमर के पाषाण की पेढ़ी एवं सभागार हैं, जहां पौष दशमी मेले एवं अन्य बैठकों का आयोजन के साथ ट्रस्ट मंडल द्वारा विभिन्न समारोह इसी प्रांगण में आयोजित किए जाते हैं।

‘श्री जैन श्वेतांबर नाकोड़ा पार्श्वनाथ तीर्थ ट्रस्ट’
तीर्थ की सुरक्षा, रख-रखाव, नवनिर्माण, यात्रियों को पूर्ण सुविधाओं के साथ साधु-साध्वियों को पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध करवाने के लिए बकायदा ‘श्री जैन श्वेतांबर नाकोड़ा पार्श्वनाथ तीर्थ ट्रस्ट’ बना हुआ हैं। ट्रस्ट मंडल हर समय पूरी तरह सक्रिय रहकर अपने दायित्वों का निर्वहन करता हैं। संभवत: यह भी एक प्रमुख कारण हैं कि यहां आने वाले श्रद्धालु पूरी तरह संतुष्ट होकर लौटते हैं एवं तीर्थ की प्रतिष्ठा अनवरत रूप से बढ़ती जा रही हैं। इस पावन तीर्थ पर दर्शनार्थ जैन धर्मावलंबियों के अतिरिक्त अन्य धर्म-संप्रदायों के लोग भी पहुंचते हैं। यात्रियों की सुविधा के लिए तीर्थ पर कमरों की लंबी श्रृंखला हैं। अनेक विशाल धर्मशालाएं बनी हुई हैं। यहीं नहीं, यात्रियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए ट्रस्ट मंडल की ओर से और धर्मशालाएं बनाया जाना प्रस्तावित हैं। तीर्थ पर विशाल भैरव भोजनशाला हैं तथा मेले के समय विशाल भू-भाग में फैले नवकारसी भवन का उपयोग किया जाता हैं।

जोधपुर मुख्यालय से 116 किमी/बालोतरा से 12 किमी
जैन तीर्थ ‘श्री नाकोड़ा पार्श्वनाथ’ जोधपुर से 116 किमी तथा बालोतरा से 12 किमी दूरी पर  होने के साथ ही जोधपुर-बाड़मेर मुख्य रेल मार्ग पर स्थित हैं। जोधपुर-बाड़मेर सहित आसपास के लगभग सभी स्थानों से सडक़ मार्ग से तीर्थ स्थल पर सुगमता से पहुंचा जा सकता हैं। मंदिर के खुलने का समय गर्मी(चैत्र सुदी एकम् से कार्तिक वदी अमावस तक) में प्रात: 5.30 बजे से रात्रि 10 बजे तक एवं सर्दी(कार्तिक सुदी एकम. से चैत्र वदी अमावस तक) प्रात: 6 बजे से रात्रि 9.30 बजे तक रहता हैं।

Wednesday, 2 December 2015

डॉ. नगेन्द्र शर्मा: ‘मिर्गी रोग’ को जड़-मूल से खत्म करने को संकल्पित शख्सियत (Dr. Nagendra Sharma: A Personality Dedicated to Eradicate Epilepsy Disease)

घनश्याम डी रामावत
डॉ. नगेन्द्र शर्मा अर्थात एक ऐसा नाम/शख्सियत जो आज किसी परिचय का मोहताज नहीं हैं। सार्वजनिक जीवन में वैसे तो डॉक्टर को भगवान का ही दर्जा प्राप्त हैं, किन्तु बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो इसे अपनी कर्मशीलता के माध्यम से असल में अमली जामा पहना पाते हैं। जोधपुर के वरिष्ठ न्यूरोसर्जन डॉ. नगेन्द्र शर्मा ऐसा ही व्यक्तित्व हैं जिन्होंने सही मायने में अपने आप को इस रूप में साबित किया हैं। मर्ज की दुनियां से ‘मिर्गी रोग’ को जड़-मूल से खत्म करने को संकल्पित डॉ. शर्मा आज इस बीमारी से ग्रस्त रोगियों के लिए वाकई भगवान बन चुके हैं। जोधपुर के जाने-माने मिर्गी रोग विशेषज्ञ/वरिष्ठ न्यूरो सर्जन डॉ. नगेन्द्र शर्मा पिछले 17 वर्षो से लगातार प्रत्येक माह की 30 तारीख को राठी अस्पताल में मिर्गी रोगियों के इलाज के लिए नि:शुल्क शिविर आयोजित करते चले आ रहे हैं। डॉ. शर्मा की ओर से 30 नवम्बर 2015 को 203वां शिविर आयोजित किया गया, जिसमें उनके द्वारा मरीजों की जांच कर उन्हें विधिवत रूप से दवाईयां उपलब्ध कराई गई।

डॉ. शर्मा के मिर्गी रोग को खत्म करने और खासकर मिर्गी रोगियों को इस बीमारी की जकडऩ से मुक्त कराने के संकल्प के चलते मेरे जेहन में भी डॉ. शर्मा को लेकर कुछ जिज्ञासाओं ने जन्म लिया.. और मैं पहुंच गया उनसे मिलने उनके पंचवटी कॉलोनी स्थित आवास पर। डॉ. शर्मा को जानने-समझने बैठा तो मालूम हुआ कि पश्चिमी राजस्थान/मारवाड़ में आज भी अनगिनत मिर्गी रोगी हैं। डॉ. शर्मा हर माह की 30 तारीख को न केवल शिविर में नि:शुल्क जांच और इलाज करते हैं अपितु पूरी तन्मयता से जागरूकता फैलाने का काम भी कर रहे हैं। पश्चिमी राजस्थान में डॉ. शर्मा से अब तक करीब 52500 मिर्गी रोगी लाभान्वित हो चुके हैं। डॉ. शर्मा से जानने को मिला कि मिर्गी रोगियों के बढऩे में 60 प्रतिशत भूमिका सडक़ दुर्घटनाओं की हैं। उनके अनुसार सडक़ दुर्घटना के दौरान सिर में लगने के बाद अधिकांश मामलों में मरीज मिर्गी रोग का शिकार हो जाता हैं। डॉ. शर्मा ने कहा कि अब समय आ गया हैं जब मिर्गी रोग के साथ-साथ लोगों को विशेष रूप से सडक़ सुरक्षा को लेकर जागरूक होना होगा।

अब मिशन ‘सडक़ सुरक्षा के प्रति जागरूकता’
डॉ. शर्मा का मानना हैं कि मिर्गी रोग और बढ़ती सडक़ दुर्घटनाओं को देखते हुए इन दोनों विषयों को कॉलेज और विद्यालयों में शिक्षा की पुस्तकों में शामिल करने की नितान्त आवश्यकता हैं। डॉ. शर्मा के अनुसार मिर्गी रोग पर नियंत्रण के साथ अब उनका मिशन सडक़ सुरक्षा के प्रति जागरूकता को लेकर रहेगा। इसके तहत वे अपना पहला व्याख्यान सितम्बर 2015 में जोधपुर के सरदार पटेल पुलिस महाविद्यालय में राज्य सरकार की ओर से पुलिस महाविद्यालय, परिवहन विभाग और ट्रैफिक पुलिस के संयुक्त देखरेख में आयोजित कार्यक्रम में दे चुके हैं। यहीं नहीं, इस संदर्भ में उन्होंने बकायदा राजस्थान पुलिस के महानिदेशक मनोज भट्ट और प्रदेश के परिवहन विभाग को खास तौर से सुझाव भी भेजे हैं। डॉ. शर्मा के अनुसार उनके द्वारा वर्षो से किए जा रहे मिर्गी के इलाज व जागरूकता के प्रयासों के बावजूद मारवाड़ में मिर्गी रोगियों की बढ़ती तादाद चिंताजनक हैं। विश्व की आबादी का एक प्रतिशत हिस्सा, भारत का तीन प्रतिशत तथा पश्चिमी राजस्थान का करीब 4.5 प्रतिशत व्यक्ति इस बीमारी का शिकार हैं।

'एक सफर उम्मीद का..’ से हुई थी शुरूआत
वरिष्ठ न्यूरोसर्जन डॉ. नगेन्द्र शर्मा मिर्गी रोग में इजाफे का कारण अंधविश्वास, अज्ञानता, पिछड़ापन और अशिक्षा के साथ जागरूकता के अभाव को मानते हैं। 17 वर्ष पूर्व मिर्गी रोगियों के लिए ‘एक सफर उम्मीद का..’ से अपना सफर शुरू करने वाले डॉ. शर्मा से ज्ञात हुआ कि इस वर्ष अब तक करीब 3200 मरीज सामने आए हैं जिसमें मारवाड़ के विभिन्न जिलों के अलावा गुजरात, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के मरीज इलाज कराने जोधपुर पहुंचे हैं। डॉ. शर्मा का मानना हैं कि शिविरों के माध्यम से लोगों में जागरूकता आई हैं किन्तु अभी भी खासतौर से सडक़ सुरक्षा को लेकर लोगों का जागरूक होना बेहद जरूरी हैं। दुपहिया वाहन चालकों को खासतौर से वे संदेश देते हैं कि हेलमेट अनिवार्य रूप से लगाए क्योंकि सिर में चोट लगने के बाद मिर्गी की संभावना सर्वाधिक रहती हैं। डॉ. शर्मा के अनुसार मिर्गी रोगियों की चिकित्सा/इस रोग को लेकर आम आदमी को जागरूक करना सहित इस रोग को जड़ मूल से खात्मे हेतु वे संकल्पित हैं तथा इसको लेकर उनका अभियान अनवरत रूप से जारी रहेगा।

‘मिर्गी रोग’ सही मायने में मस्तिष्क की बीमारी
मिर्गी रोग सही मायने में मस्तिष्क की बीमारी हैं। मस्तिष्क में 8 बिलियन न्यूरोन होते हैं। न्यूरोन में इलेक्ट्रिसिटी पैदा होती हैं। इलेक्ट्रिसिटी का प्रभाव बाहर नहीं निकले इसलिए हर न्यूरो के चारों और माइलिन शीट होती हैं। मिर्गी के रोगियों में कुछेक न्यूरोन की माइलिन शीट टूट जाती हैं, जिससे करंट बाहर आकर अन्य न्यूरोन को झटके देता हैं। यही झटके ताणे कहलाती हैं। मिर्गी रोग का पता ईईजी जांच से चलता हैं। वरिष्ठ न्यूरोसर्जन/मिर्गी रोग विशेषज्ञ डॉ. नगेन्द्र शर्मा के अनुसार ‘मिर्गी’ का दौरा 15 से लेकर 45 सैकेण्ड तक आता है। इसके बाद 2 से 3 मिनट रोगी के कोशिकाओं को सामान्य होने में लगता हैं। 10 से 15 मिनट में रोगी पूरी तरीके से सामान्य हो जाता हैं। गांव वाले भोपे और देवी देवताओं का हाथों-हाथ स्मरण व ध्यान करवाते हैं। दस मिनट में रोगी वैसे ही सामान्य होने वाला होता हैं। ऐसे में भोपों की चल पड़ती हैं। डॉ. शर्मा के अनुसार यही मूल बात लोगों के लिए समझने वाली हैं कि जाड़-फूक/तंत्र-मंत्र अथवा देवी-देवताओं का ध्यान करवाने से कुछ देर बाद सामान्य अवस्था में आ जाना रोगी का इलाज नहीं हैं अपितु वह एक सामान्य प्रक्रिया हैं। रोगी का सही व स्थायी इलाज उसकी समयबद्ध चिकित्सा ही हैं। डॉ. शर्मा के अनुसार मिर्गी आने पर रोगी को तुरन्त लेटा देना चाहिए।

12 हजार रोगी स्वस्थ होकर जी रहे हैं सामान्य जीवन
न्यूरो सर्जन डॉ. नगेन्द्र शर्मा के अनुसार उनके इतने वर्षो के प्रयास अब वाकई रंग लाने लगे हैं, उनके अनुसार थार प्रदेश के निजी व सरकारी अस्पतालों में मिर्गी रोगियों की बढ़ती तादाद इस बात का द्योतक हैं। डॉ. शर्मा का मानना हैं कि अब लोग यह समझने व महसूस करने लगे हैं कि मिर्गी का सही इलाज चिकित्सा ही हैं, झाड़-फूंक/तंत्र-मंत्र अथवा अंधविश्वास/जादू-टोना नहीं। न्यूरो सर्जन डॉ. शर्मा के अध्ययन के अनुसार मिर्गी रोग से ग्रसित 96 फीसदी रोगी अंधविश्वास, जादू-टोना और झाड़-फूंक करने के बाद डॉक्टर के पास पहुंचते हैं तब तक मरीज का रोग बहुत ही विकृत अवस्था में पहुंच जाता हैं। डॉ. शर्मा से चिकित्सा प्राप्त रोगियों में से करीब 12 हजार मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो चुके हैं और वे अपनी सामान्य जिंदगी जी रहे हैं।

सामाजिक सरोकारों में भी बढ़-चढ़ कर भागीदारी
वरिष्ठ न्यूरोसर्जन/मिर्गी रोग विशेषज्ञ डॉ. नगेन्द्र शर्मा अपनी चिकित्सकीय जिम्मेदारी के साथ ही सामाजिक सरोकारों में भी बढ़-चढ़ कर सहभागिता का निर्वहन करते हैं। फिर चाहे वह सामाजिक स्तर पर हो अथवा अपने चिकित्सकीय पेशे से संबंधित विभिन्न संगठनों से ताल्लुक रखने वाली अहम भूमिकाओं का हो.. डॉ. शर्मा अपने दायित्वों का बखूबी जिम्मेदारी से निर्वहन करते हैं। पिछले दिनों श्री जूना खेड़ापति बालाजी मंदिर परिसर, जोधपुर में आयोजित चातुर्मास महोत्सव के दौरान श्री सम्प्रदाय(रामावत) एवं राम भक्ति परम्परा की मूल आचार्य पीठ ‘श्री मठ’ पंच गंगा घाट-काशी के जगद्गुरू रामानन्दाचार्य पद प्रतिष्ठित रामनरेशाचार्य के हाथों अति-विशिष्ट सम्मान ‘रामभावाभिषिक महानुभाव अभिनन्दन पत्र’ से नवाजे जा चुके डॉ. शर्मा अपनी बेहतरीन कर्मशीलता के चलते अब तक कुल 19 बार सम्मानित हो चुके हैं। बोर्ड ऑफ राजस्थान हेल्थ यूनिवर्सिटी द्वारा सिंडीकेट सदस्य के रूप में नियुक्ति, राज्य सरकार द्वारा मिर्गी रोग पर हिन्दी में पुस्तक प्रकाशित किए जाने पर ‘हिन्दी सेवा सम्मान’ एवं मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट की ओर से ‘राव जोधा स्मृति पुरूस्कार/मारवाड़ रत्न’ जैसे अति-प्रतिष्ठित सम्मान डॉ. शर्मा प्राप्त कर चुके हैं।

एक चिकित्सक के साथ एक बेहतरीन इंसान के रूप में अपने दायित्वों को निर्वहन करने के लिए जोधपुर ईद मिल्लादुन्नबी सोसायटी द्वारा ‘समाज रत्न’, पश्चिमी राजस्थान के ग्रामीण हल्कों के साथ खासकर आर्थिक रूप से कमजोर तबकों के लिए अनुकरणीय सेवाओं के लिए ‘वीर दुर्गादास स्मृति अवार्ड’, जोधपुर म्यून्सिपल कॉर्पोरेशन की ओर से ‘जोधपुर गौरव अलंकरण’, मरूधरा पत्रकार संस्थान द्वारा ‘मरूधरा मीडिया फेलो’, अंतर्राष्ट्रीय समन्वयक परिवार की ओर से ‘मानवता के प्रति समर्पित नर नारायण सेवा सम्मान’, टाइम्स ग्रुप द्वारा ‘फूट प्रिंट्स’, वृक्षारोपण क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्यो के लिए ‘वृक्ष बंधु पुरूस्कार’, मारवाड़ ग्रुप फॉर एज्यूकेटिंग पीपल एंड फ्री सर्विस टू सोसायटी द्वारा ‘मारवाड़ रत्न’, पिछली भाजपा सरकार(राजस्थान) के स्वास्थ्य मंत्री दिगम्बरसिंह के हाथों ‘मीडिया फेलो’, स्वतंत्रता दिवस पर जिला कलेक्टर द्वारा बहुमान, हिमालय फार्मा द्वारा न्यूरोसर्जरी क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्यो के लिए  ‘हेल्थ एक्सीलेंस अवार्ड’, रोटरी क्लब द्वारा ‘के आर सिंघवी रोटरी वॉकेशनल सर्विस अवार्ड’, इंटरनेशनल लॉयन(वेस्टर्न जोधपुर क्लब जोन) द्वारा ‘विशिष्ठ जन सम्मान’ व जोधपुर स्वयं सेवी संस्थान संघ की ओर से ‘डेडिकेटेड टू ह्यूमेनिटी’ जैसे महत्वपूर्ण अवार्ड हासिल करने के साथ ही जोधाणा फोटो जर्नलिस्ट सोसायटी के हाथों डॉ. शर्मा सम्मानित हो चुके हैं।

‘मिर्गी रोग’ से संबंधित पुस्तकों का प्रकाशन
सामाजिक सरोकारों की गंभीरता से समझ रखने वाले डॉ. नगेन्द्र शर्मा अपनी चिकित्सकीय व्यस्तताओं के बावजूद संदर्भ में जिम्मेदारियों को श्रेष्ठतम तरीके से आत्मसात करते हुए अपने दायित्वों का बखूबी निर्वहन कर रहे हैं। डॉ. शर्मा वर्तमान में राजस्थान ब्राह्मण महासभा से संबद्ध होने के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय ब्राह्मण फेडरेशन-जोधपुर इकाई(ग्रामीण अध्यक्ष), गौड़ ब्राह्मण महासभा(राजस्थान) के प्रदेश संरक्षक के तौर पर सामाजिक क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इसके अलावा प्राइवेट डॉक्टर एसोसिएशन(एम्पोज) जोधपुर-अध्यक्ष, शेखावटी समाज संस्थान-जोधपुर इकाई अध्यक्ष तथा नॉर्थ साउथ फाउण्डेशन स्कॉलरशिप जैसी अति-महत्वपूर्ण संस्था में बतौर सदस्य अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे हैं। वरिष्ठ न्यूरोसर्जन/मिर्गी रोग विशेषज्ञ डॉ. नगेन्द्र शर्मा द्वारा लिखित ‘मानव मस्तिष्क और मिर्गी’ पुस्तक का वर्ष 2005 में प्रकाशन हो चुका हैं। डॉ. शर्मा की एक अन्य पुस्तक ‘मिर्गी : कारण और निवारण’ भी प्रकाशित हो चुकी हैं जिसका अति-जल्द विमोचन होने वाला हैं।

Tuesday, 1 December 2015

जोधपुर उम्मेद भवन पैलेस: मारवाड़ का ताजमहल

घनश्याम डी रामावत
वैसे तो ताजमहल आगरा में स्थित हैं लेकिन पश्चिमी राजस्थान में भी ऐसा ही एक महल हैं जिसे लोग मारवाड़ का ताजमहल कहते हैं। यह महल हैं जोधपुर स्थित ‘उम्मेद भवन पैलेस’। उम्मेद भवन पैलेस का नाम इसके संस्थापक महाराजा उम्मेद सिंह के नाम पर रखा गया हैं। चित्तर पहाड़ी पर होने के कारण यह सुंदर महल ‘चित्तर पैलेस’ के रूप में भी जाना जाता हैं। यह भारत-औपनिवेशिक स्थापत्य शैली और डेको-कला का एक आदर्श उदाहरण हैं। डेको कला स्थापत्य शैली यहां हावी हैं और यह 1920 और 1930 के दशक के आसपास की शैली हैं। हॉल को तराशे गये बलुआ पत्थरों को जोड़ कर बनाया गया था। महल के निर्माण के दौरान पत्थरों को बांधने के लिये मसाले का उपयोग नहीं किया गया था। यह विशिष्टता बड़ी संख्या में पर्यटकों को इस महल की ओर आकर्षित करती हैं। इस सुंदर महल के वास्तुकार हेनरी वॉन, एक अंग्रेज थे। महल का एक हिस्सा हेरिटेज होटल में परिवर्तित कर दिया गया हैं, जबकि बाकी हिस्सा एक संग्रहालय के रूप में हैं।
इसके अस्तित्व में आने अर्थात निर्माण के पीछे की कहानी भी बड़ी दिलचस्प हैं। यह सही मायने में इसके संस्थापक महाराजा उम्मेदसिंह के ख्वाब की एक हसीन ताबीर हैं। यह महल अकाल से त्रस्त जनता को रोजगार देने के मकसद से बनाया गया था। जब तत्कालीन मारवाड़ रियासत की जनता भूख से मर रही थी तो महाराजा उम्मेदसिंह ने इस महल का निर्माण करने का निर्णय किया। इस भवन के निर्माण का आर.बी शिवरतन मोहता को ठेका दिया गया था। वास्तुविद व शिल्पविद जी.ए गोल्ड स्ट्रा ने वास्तु भूमिका का निर्वहन किया था। इसके लिए पत्थर लगाने, लाने, चुनाई और टांचने(तराशने) आदि तक के सारे काम मारवाड़ के मजदूरों व कारीगरों से ही करवाए गए, ताकि उन्हें रोजगार मिले। जोधपुर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 65 से लगभग 5-6 किमी की दूरी पर स्थित ‘उम्मेद भवन पैलेस’ रियासत की कई परंपराओं का साक्षी और एक ऐसी धरोहर हैं, जिस पर सभी को नाज हैं।

शादियों व राजसी पार्टियों के लिए पहली पसन्द
उम्मेद भवन के एक हिस्से को म्यूजियम और दूसरे हिस्से को हेरिटेज होटल का रूप दिया गया हैं। उम्मेद भवन पैलेस के अली अकबर हॉल कई यादगर आयोजनों के लिए जाना जाता हैं। पहले भवन के अंदर घुसते ही अंदरूनी हिस्से में झाडियां थीं जहां पार्किग होती थी, बाद में विंटेज कारें रखी गई। ये कारें रैली के समय निकलती हैं। इसका लॉन व बरादरी बरसों से शानदार म्यूजिकल कार्यक्रमों के लिए जाने जाते हैं। मौजूदा दौर में ‘उम्मेद भवन पैलेस’ ऊंचे दर्जे की शाही शादियों व राजसी पार्टियों के लिए सर्वाधिक पसंद किया जाने वाला स्पॉट हैं। म्यूजिकल नाइट में जब यह रंग-बिरंगी रोशनी में जगमगाता हैं, इसकी आभा अत्यधिक शानदार/अद्भुत/लाजवाब नजर आती हैं। पर्यटकों द्वारा अत्यधिक पसंद किए जाने वाले इस स्पॉट ‘उम्मेद भवन पैलेस’ को देखने हेतु बकायदा शुल्क निर्धारित हैं।

रॉयल लुक करता हैं पर्यटकों को आकर्षित
लॉन सहित करीब 26 एकड़ में फैले ‘उम्मेद भवन पैलेस’ को तराशे हुए पीले और सुनहरे रंग के पत्थरों से बनाया गया हैं। उम्मेद भवन बड़े ही राजसी अंदाज में राजस्थान की धरोहर को समेटे हुए हैं। बेजोड़ कारीगरी और नक्काशी इस महल की शोभा बढ़ाती हैं। शाही शानो-शौकत से भरपूर ‘उम्मेद भवन पैलेस’ का रॉयल लुक पर्यटकों को अत्यधिक आकर्षित करता हैं। यहीं कारण हैं कि यहां हमेशा पर्यटकों को बेतहाशा भरमार रहती हैं। जो लोग जोधपुर घूमने आते हैं, वे ‘उम्मेद भवन पैलेस’ का भ्रमण किए बिना नहीं रह पाते हैं। यह वास्तुकला का बेहतरीन नमूना तो हैं ही, इसकी दीवारों पर बहुत ही सुन्दर और कलात्मक कारीगरी की गई हैं। इसका शिलान्यास 18 नवम्बर 1929 को महाराजा उम्मेदसिंह ने किया। तामीर स्थल की लंबाई 195 मीटर और चौड़ाई 103 मीटर हैं। निर्माण पर कुल एक करोड़ 9 लाख 11 हजार 228 रूपए खर्च हुए। ‘उम्मेद भवन पैलेस’ में 15 एकड़ भूमि पर बगीचा हैं। केंद्रीय गुम्बज की ऊंचाई 150 फीट हैं तथा गोलाई के लिए 15 बड़े-बड़े स्तम्भ प्रयुक्त में लिए गए।

ट्रेडिशन और लग्जरी का बेहतरीन कॉम्बिनेशन
‘उम्मेद भवन पैलेस’ में कुल 365 कमरे हैं। 40 से ज्यादा लग्जरीयस हैं, जिनको सुविधाओं के लिहाज से रूम, रायल सुईट, महाराजा सुईट और महारानी सुईट में बाटा गया हैं। इन कमरों में ट्रेडिशन और लग्जरी का बेहतरीन कॉम्बिनेशन हैं। खिडक़ी और बालकोनी से नजर दौड़ाने पर दिलकश ऩारे दिखाई देते हैं। एंटिक डिजाइन का सोफा, बेड और इंटीरियर यहां के कमरों को कलात्मक टच देते हैं। यहां स्टाइलिश फाउंटेन, पुल, स्पॉ और जिम फैसिलिटी का आनंद भी लिया जा सकता हैं। खाने के लिए शानदार रेस्टोरेंट हैं, जहां पैलेस की छत पर खुले आसमां के नीचे राजस्थानी लजीज व्यंजनो का लुत्फ़ उठाया जा सकता हैं। राजस्थान व खासकर मारवाड़ की संस्कृति से पर्यटकों को रूबरू करने के लिए शाम के वक्त यहां लोकगीत, नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता हैं।

आकर्षित करता हैं राजसी अंदाज वाला स्पॉट
‘उम्मेद भवन पैलेस’ शादी और निजी आयोजनों के लिए लोगों की पसंदीदा जगह हैं। इसके अतिरिक्त हनीमून कपल्स और अक्जाटिक ट्रेवलिंग का शौक रखने वालो को भी राजसी अंदाज वाला यह महल खूब लुभाता हैं। ‘उम्मेद भवन पैलेस’ में रुकना अपने आप बेहद सुकून भरा हैं। यहां ठहरने वाले पर्यटक यदि जोधपुर/सूर्यनगरी की सुन्दरता को और करीब से देखने की चाहत रखते हैं तो, मेहरानगढ़ किले का भ्रमण कर सकते हैं जो पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। फूल महल, झांकी महल और राव जोधा डेजर्ट रॉक पार्क भी दर्शनीय हैं।

Monday, 30 November 2015

विजय लक्ष्मी प्रजापति: जोधपुर की पहली महिला फोटोग्राफर

घनश्याम डी रामावत
भारतीय संस्कृति में महिलाओं का शुरू से ही विशेष सम्मान रहा हैं एवं खास तौर से बेटियों के बारे में अपने देश में सदियों से बहुत कुछ कहा जाता रहा हैं। बेटी जब भी गर्व भरा काम करती हैं, उसकी उपलब्धि पर न केवल उसका अपना परिवार नाज करता हैं बल्कि समूचा देश स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता हैं। और हो भी क्यों नहीं, आखिर बेटियां देश, समाज व हर परिवार की शान जो होती हैं। लेकिन इन सब के बीच.. बेटी जब बहू के रूप में भी कुछ खास कर जाएं, इस शान में चार चांद लगना लाजमी हैं। ऐसी ही एक बेटी और बहू हैं सूर्यनगरी की विजय लक्ष्मी प्रजापति। उम्र की ढ़लान पर एक गृहिणी के रूप में इन दिनों आध्यात्मिक जीवन जी रही विजय लक्ष्मी प्रजापति की पहचान जोधपुर की पहली महिला प्रोफशनल फोटोग्राफर के रूप में रही हैं। राजस्थानी में एम.ए. तक शिक्षा प्राप्त विजय लक्ष्मी ने वर्षो पहले उस समय कैमरा हाथ में पकड़ा, जब महिलाओं के व्यवसायिक तौर पर घर से बाहर निकलने को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था। प्रोफेशनल फोटोग्राफर के तौर पर करीब तीन दशकों तक राजस्थान व खासकर सूर्यनगरी जोधपुर की सभ्यता व संस्कृति से जुड़ी हर तस्वीर को अपने कैमरे में कैद कर इसकी खूशबू को पूरे देश में फैलाने के साथ ही वर्ष 2013 में प्रदेश की राजधानी जयपुर में ऑल इंडिया वैलफेयर सोसायटी और लिविंग सोल एनजीओ की ओर से आयोजित कार्यक्रम ‘कुरजा-4’ में मशहूर ऑलम्पियन मिल्खा सिंह के हाथों ‘बेटी सृष्टि रत्न’ अवार्ड से सम्मानित विजय लक्ष्मी प्रजापति आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। 

बचपन से ही अच्छे संस्कारों के बीच पली-बढ़ी
अस्सी के दशक में जब महिलाओं को व्यवसायिक दृष्टि से घरों से बाहर निकलने की पूरी आजादी नहीं थी, बचपन से ही अच्छे संस्कारों के बीच पली-बढ़ी सरल व संजीदा व्यक्तित्व की धनी विजय लक्ष्मी ने प्रोफेशनल फोटोग्राफर के तौर पर हाथों में कैमरा पकड़ कर सभी को चौका दिया। इसमें इन्हें सबसे बड़ा सहयोग मिला पति जगदीश चंद्र से। शिक्षा विभाग में सेवारत्त पति जगदीश चंद्र नौकरी के साथ फोटोग्राफी भी किया करते थे। यहीं से इन्हें फोटोग्राफी का शौक लगा और अपने पति से इन्होंने कैमरा चलाना सीखा। अपनी उम्र के 65 बसंत पार कर चुकी विजय लक्ष्मी अपने फोटो कला प्रेम और इससे जुड़े शुरूआती संस्मरणों को याद कर आज भी रोमांच से भर जाती हैं। आज अचानक मन किया तो विजय लक्ष्मी से मिलने जा पहुंचा उनके शक्ति नगर स्थित आवास पर। घर पर वे उसी अंदाज में मिली जैसी अपेक्षा थी, उम्र के इस पड़ाव पर भी वहीं जोश-वहीं ताजगी, हाथ में अखबार थामे वे देश-दुनियां के हालचाल जानने में व्यस्त थी। बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो वाकई बहुत कुछ जानने व समझने का मिला उनसे.. विजय लक्ष्मी के अनुसार उन्होंने 1980 में फोटोग्राफी क्षेत्र में कदम रखा। ब्लेक एंड व्हाइट से लेकर कलर फोटोग्राफी के बारे में अनुभव साझा करते हुए वे बताती हैं कि उस वक्त के संघर्ष की तुलना में मौजूदा कामयाबियां व अवार्ड बहुत छोटे प्रतीत होते हैं।

शुरूआत में बड़े-बुजुर्गों का विरोध झेलना पड़ा
अपने फोटोग्राफी शौक के चलते विजय लक्ष्मी को संयुक्त परिवार की वजह से शुरूआत में बड़े-बुजुर्गों का काफी विरोध भी झेलना पड़ा। किन्तु पति जगदीश चंद्र का उन्हें हमेशा सहयोग मिला। विजय लक्ष्मी के अनुसार एक समय ऐसा आया जब पति को बीमारी ने आंशिक रूप से जकड़ लिया, नतीजतन घर-परिवार की आर्थिक स्थिति बिगडऩे लगी। ऐसे में उनकी शौकिया फोटोग्राफी ने प्रोफेशनल रूप ले लिया और वे शादी-ब्याह, त्यौहारों व सभा-सम्मेलनों में फोटोग्राफी करने लगी। फोटो खींचने से लेकर डवलपिंग(चूंकि उन दिनों ब्लेक एंड व्हाइट का जमाना था) व प्रिंटिंग करके ग्राहकों को देना..सब कुछ खुद ही कर लेती थी। राजपूत समाज में पर्दा प्रथा का रिवाज होने के चलते विजय लक्ष्मी बतौर फोटोग्राफर हमेशा उनकी पहली पसंद रही। एक बार उदयपुर राजघराने के द्वारा खास तौर से इन्हें फोटो खींचने बुलाए जाने के बाद तो विजय लक्ष्मी राजपूत घरों की पसंदीदा फोटोग्राफर ही बन गई। राजस्थानी में एम ए विजय लक्ष्मी बताती हैं कि उन्होंने पहली बार कैमरा उपयोग में लेते हुए एक बच्चें की फोटो खींची थी। जोधपुर के पब्लिक पार्क में उन्होंने ‘वाइल्ड एनीमल्स’ की फोटोग्राफी प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और यहीं से उनका प्रोफेशनल सफर शुरू हो गया। उनके अनुसार उन्हें असली पहचान मरूधरा फोटोग्राफी सोसायटी ने दिलाई।

‘वाइल्ड एनीमल्स’ की फोटो बेस्ट अचीवमेंट
विजय लक्ष्मी ने महानगर में होने वाली हर प्रतियोगिता में हिस्सा लिया व पुरूस्कार जीते। इसके अलावा पर्यटन, कला व संस्कृति विभाग के द्वारा भी इन्हें, वर्ष 1984 में इनके द्वारा बांध के लिए एक छायाचित्र संदर्भ में सम्मानित(द्वितीय पुरूस्कार) किया जा चुका हैं। अपने कैमरे में हजारों दृश्यों को कैद कर चुकी विजय लक्ष्मी प्रजापति जीवन का बेस्ट अचीवमेंट ‘वाइल्ड एनीमल्स’ की फोटो को मानती हैं। महिला साक्षरता को बढ़ावा देने हेतु इससे जुड़े नारे भले ही नब्बे के दशक में परवान चढ़े हो, विजय लक्ष्मी ने ‘पढ़ी लिखी जब होगी माता, घर की बनेगी भाग्य विधाता’, ‘हर महिला को शिक्षित बनाओ, परिवार में खुशहाली लाओ’ एवं ‘एक नारी पढ़ेगी, सात पीढ़ी तरेगी’ जैसे नारों को वर्षो पहले ही आत्मसात करते हुए चरित्रार्थ कर दिया। विजय लक्ष्मी ने शादी के बाद न केवल अपनी मेट्रिक से आगे की पढ़ाई करते हुए राजस्थानी में एम ए किया, अपने परिवार की शिक्षा को लेकर भी सजगता बरती। नतीजतन दोनो संताने सरकारी सेवा में हैं, बेटा इंजीनियर व बेटी अध्यापिका हैं। एक महिला के तौर पर हासिल अचीवमेंट को राज्य सरकार द्वारा गंभीरता से नहीं लिए जाने के सवाल का विजय लक्ष्मी कोई सीधा जवाब तो नहीं दे रही किन्तु यह अवश्य कहती हैं कि महिला सम्मान व प्रोत्साहन को लेकर अब वाकई सरकारों को दिल से संजीदा होने की आवश्यकता हैं। उनकी स्पष्ट मान्यता हैं कि आज की महिला किसी भी मायने में पुरूषों से कम नहीं हैं। भविष्य में गर्वनमेंट द्वारा उन्हें किसी स्तर पर सम्मानित किए जाने के सवाल पर वे बस मुस्कराकर रह जाती हैं।

जोधपुर का मेहरानगढ़ दुर्ग: बारीक नक्काशी और विशाल प्रांगण के लिए दुनियाभर में खास पहचान

घनश्याम डी रामावत
अपनी बेहतरीन संस्कृति व अपणायत के लिए देश ही नहीं विदेश तक में खास पहचान रखने वाला पश्चिमी राजस्थान का प्रमुख शहर जोधपुर अपने दुर्ग को लेकर भी विशेष तौर पर जाना जाता हैं। ‘मेहरानगढ़’ दुर्ग की भव्यता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता हैं कि यह जोधपुर शहर के धरातल से 112 मीटर की ऊंचाई पर हैं। यह दुर्ग चारों ओर से अभेद्य प्राचीरों से घिरा हुआ हैं। यह दुर्ग बारीक नक्काशी और विशाल प्रांगण के लिए दुनियाभर में जाना जाता हैं। इस विशाल दुर्ग के भीतरी परिसर में अनेक महल और मंदिर हैं। एक घुमावदार घाटी और सडक़ से यह दुर्ग जोधपुर शहर से जुड़ता हैं। दुर्ग की प्राचीरों पर अब भी जोधपुर के महाराजा और जयपुर की सेना के बीच हुए युद्धों के प्रतीक तोप के गोलों के निशान के रूप में अंकित हैं। किले के बायीं ओर कीरतसिंह सोढ़ा की छतरी हैं। यह एक योद्धा था जिसने किले की रक्षा के लिए अपनी जान न्योछावर की थी। यहां के राजा मानसिंह ने अपनी विजयों की स्मृति में सात दरवाजे बनवाए थे। जयपुर और बीकानेर के शासकों को हराने के उपलक्ष में जयपोल बनवाया गया। इसके अलावा फतेहपोल द्वारा का निर्माण महाराजा अजीत सिंह ने मुगलों पर फतेह पाने के बाद कराया था। इन द्वारा पर आज भी तब के युद्धों के निशान बाकी हैं, जिन्हें देखना अद्भुत हैं।
मेहरानगढ़ का संग्रहालय देश के सबसे बेहतरीन संग्रहालयों में से एक हैं। इस संग्रहालय में अतीत की महत्वपूर्ण वस्तुओं का संग्रह किया गया हैं। इनमें 1730 में गुजरात के शासक से लड़ाई में जीती विशाल पालकी भी हैं, इसके अलावा हथियार, वेशभूषा, पेंटिंग और ऐतिहासिक विरासतों की लंबी श्रंखला यहां संग्रहित की गई हैं। कामयाब अंग्रेजी फिल्म ’डार्क नाइट’ के कुछ हिस्से भी मेहरानगढ़ में फिल्माए जाने के बाद यह हॉलीवुड के लिए भी एक शानदार डेस्टीनेशन बन गया। यहां ब्रूस वेन को कैद करने, जेल पर हमला करने आदि के दृश्य फिल्माए गए थे।
राव जोधा ने बसाया था जोधपुर
जोधपुर नगर राव जोधा ने बसाया था। उन्होंने यहां 1438 से 1488 तक लंबे समय तक शासन किया। वे रावल के 24 पुत्रों में से एक थे। चारों ओर शत्रुओं से घिरे होने के कारण उन्होंने जोधपुर की राजधानी को किसी सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने की योजना बनाई। वे मानते थे कि मंडोर का किला जोधपुर की सुरक्षा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। राव सामरा के बाद उनके पुत्र राव नारा ने जोधपुर की कमान संभाली और पूरे मेवाड़ को मंडोर के छत्र के नीचे सुरक्षित किया। राव जोधा ने राव नारा को दीवान का खिताब दिया था। राव नारा की मदद से जोधा ने 12 मई 1459 को मेहरानगढ़ की नींव रखी। यह दुर्ग मंडोर से 9 किमी की दूरी पर दक्षिण में भौरचिरैया पहाड़ी पर बनाया गया। कहा जाता हैं उस पहाड़ी पर पक्षियों के स्वामी चिरैया का राज था। महल की नींव पड़ जाने के बाद चिरैया को यहां से विस्थापित होना पड़ा। इस पर चिरैया ने यहां हमेशा सूखा पडऩे का श्राप दिया। कहा जाता है उसके बाद कई बरसों तक यहां सूखा पड़ा। तब राव ने एक मंदिर बनाकर श्राप से मुक्ति पाई। इस दुर्ग के बारे में यह भी कहा जाता है कि यहां एक व्यक्ति राजाराम मेघवाल की समाधि थी। राव जोधा ने राजाराम के परिजनों से दुर्ग के एक हिस्से पर राजाराम के परिजनों के हक का वादा किया था। यह हक आज भी अदा किया जा रहा है और दुर्ग के एक हिस्से ’राजाराम मेघवाल गार्डन’ में आज भी उसके वंशज निवास करते हैं।

राव जोधा ने रखा था दुर्ग का नाम मिहिरगढ़
मेहरानगढ़ संस्कृत के ’मिहिर’ से बना हैं। जिसका अर्थ होता है सूर्य। राव जोधा सूर्य के उपासक थे इसलिए उन्होंने इस दुर्ग का नाम मिहिरगढ़ रखा। लेकिन राजस्थानी बोली में स्वर मिहिरगढ़ से मेहरानगढ़ हो गया। राठौड़ अपने आप को सूर्य के वंशज भी मानते हैं। किले के मूल भाग का निर्माण जोधपुर के संस्थापक राव जोधा ने 1459 में कराया। इसके बाद 1538 से 1578 तक शासक रहे जसवंत सिंह ने किले का विस्तार किया। किले में प्रवेश के लिए सात विशाल द्वार इसकी शोभा हैं। 1806 में महाराजा मानसिंह ने जयपुर और बीकानेर पर जीत के उपलक्ष में दुर्ग में जयपोल का निर्माण कराया। इससे पूर्व 1707 में मुगलों पर जीत के जश्न में फतेलपोल का निर्माण कराया गया था। दुर्ग परिसर में डेढ कामरापोल, लोहापोल आदि भी दुर्ग की प्रतिष्ठा बढाते हैं। दुर्ग परिसर में सती माता का मंदिर भी हैं। 1843 में महाराजा मानसिंह का निधन होने के बाद उनकी पत्नी ने चिता पर बैठकर जान दे दी थी। यह मंदिर उसी की स्मृति में बनाया गया

किले के अंदर कई शानदार महल और स्मारक बने हुए हैं। इनमें मोती महल, फूल महल, शीशमहल, सिलेहखाना और दौलतखाना उल्लेखनीय हैं। यहां स्थित संग्रहालय में जोधुपर के शासकों और राजपरिवारों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली शाही वस्तुओं के अलावा युद्ध में काम आने वाले औजार, हथियारों को भी संग्रहित किया गया हैं। संग्रहालय को देखना अपने आप में इतिहास की खिडक़ी में झांकने जैसा हैं। यह बहुत आनंद देता हैं। संग्रहित वस्तुओं में शाही पोशाके, युद्ध पोशाके, पालने, लकड़ी की वस्तुएं, चित्र, वाद्य यंत्र, फर्नीचर व पुरानी तोपें आदि उल्लेखनीय हैं।


मोती महल व शीश महल आकर्षण का केन्द्र
मेहरानगढ़ पर 1595 से 1619 के दौरान शासन करने वाले राजा शूरसिंह ने मोती महल का निर्माण कराया था। मोती महल को वर्तमान में संग्रहालय बनाया गया हैं। दुर्ग में स्थित सभी महलों में से यह सबसे बड़ा और खूबसूरत हैं। मोती महल में बने पांच झरोखे विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। कहा जाता हैं जब राजा शूरसिंह दरबार में होते थे तो कार्रवाई देखने के लिए उनकी पांच रानियां इनमें बैठा करती थीं। राजस्थान में वैसे तो कई विशाल दुर्गों में शीशमहल बने हुए हैं किंतु मेहरानगढ़ के शीशमहल को अन्य सभी महलों से सबसे अच्छा माना जाता हैं। जयपुर के शीशमहल से इसकी तुलना की जाती हैं। राजपूत शैली के स्थापत्य का यह सबसे अच्छा उदाहरण  है। शीशमहल में छोटे-छोटे शीशों के टुकड़ों को दीवार पर चिपकाकर एक भव्य आकार दिया जाता हैं। इन शीशों पर एक विशेष प्रकार का पेंट किया जाता था। जिससे शीशों की चमक आंखों में नहीं चुभती थी और ये पर्याप्त रूप से चमक भी देते थे। मेहरानगढ़ का शीश महल वाकई देखने लायक हैं।

खूबसूरत फूलमहल एवं तख्तविलास
फूल महल का निर्माण मेहरानगढ़ पर 1724 से  1749 तक राज करने वाले  महाराजा अभय सिंह ने बनवाया था। यह एक ऐसा महल था जिसमें खुशी के अवसर पर राजपरिवार एकत्र होता था और खुशियां बनाई जाती थी। खुशी जाहिर करने के काम में आने के कारण इस महल की खूबसूरती भी शानदार हैं। कई बार राजा महाराजा यहां नृत्य के कार्यक्रमों का आयोजन भी करते थे और महफिल सजाई जाती थी। महल की छत सोने और चांदी के तरल पेंट से सजाई गई हैं। महल की सुंदरता यहां खंभों और दीवारों में साफ झलकती हैं। ‘तख्तविलास’ यह महल राजा तख्तसिंह की आरामगाह थी। 1843 से 1873 तक शासन करने वाले तख्त सिंह ने इस महल का निर्माण कराया था। तख्तविलास परंपरागत शैली में बना शानदार महल हैं जिसकी को कांच के गोलों से बनाया गया था। अंग्रेज भी इस महल की खूबसूरती को देख अचंभा करते थे।

आराध्य मां चामुंडा देवी का मंदिर
जोधपुर के शासक देवी उपासक थे। इसलिए दुर्ग में देवी मंदिर भी हैं। यहां का सबसे खास देवी मंदिर हैं ‘चामुंडा माता’। राज जोधा चामुंडा देवी के विशेष उपासक थे। 1460 में पुरानी राजधानी मंडोर से यह मूर्ति यहां लाकर स्थापित की गई थी। उल्लेखनीय हैं चामुंडा देवी मंडोर के परिहार शासकों की कुल देवी थी। राव जोधा भी चामुंडा देवी को ही अपना इष्ट मानते थे और रोजाना पूजा अर्चना किया करते थे। आज भी जोधपुर के लोगों की आराध्या देवी चामुंडा माता ही हैं और बड़ी संख्या में उनके दर्शनों के लिए श्रद्धालु यहां आते हैं। गौरतलब हैं कि 2008 में मेहरानगढ के चामुंडा देवी मंदिर में भरने वाले सालाना मेले के दौरान यहां भगदड़ मच गई थी जिसमें 250 श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी और चार सौ से अधिक घायल हो गए थे।