Saturday, 21 May 2016

जोधपुर शनिश्चर थान: प्राचीन श्यामवर्णी शनि प्रतिमा

घनश्याम डी रामावत
जोधपुर स्थित ‘शनिश्चर थान’ भारतवर्ष में भगवान शनिदेव का अकेला एक ऐसा अनूठा मंदिर हैं, जहां सूर्यपुत्र शनिदेव की पूजा शत-प्रतिशत वैष्णव तरीके से की जाती हैं। करीब 200 वर्ष प्राचीन इस मंदिर में
शनिदेव वैष्णव व रामानन्दी तिलक धारण किए हुए हैं। मंदिर में भगवान शनिदेव की एक गर्भ मूर्ति तथा दूसरा स्वरूप श्याम वर्णी हैं। गर्भ मूर्ति(पिण्ड मूर्ति) का अभिषेक ईत्र, केसर व वर्क से होता हैं। ‘शनिश्चर थान’ स्थित शनि प्रतिमा की विशेषता हैं कि मूर्ति सौम्य स्वरूप हैं। सूर्यनगरी अर्थात जोधपुर शहर के मध्य ‘शनिश्चर थान’ के नाम से विख्यात भगवान शनिदेव का यह मन्दिर लाखों-करोड़ों या यूं कहे अनगिनत लोगों की श्रद्धा का केन्द्र हैं। शनिवार को तो यहां मेले सा माहौल रहता हैं। ‘शनिश्चर थान’ में अखण्ड ज्योति प्रज्जवलित हैं और यहां भगवान शनिदेव को उड़द से निर्मित इमरती मिठाई का भोग लगाया जाता हैं। शनिदेव की श्याम वर्णी प्रतिमा को मखाने, मावे तथा ऋतु पुष्प भी अर्पित किए जाते हैं।

यहां तेल नहीं चढ़ाया जाता/शनि जयंती पर उत्सव
‘शनिश्चर थान’ मंदिर में ज्येष्ठ मास में शनि जयंती उत्सव के रूप में मनाई जाती हैं। इसी प्रकार शनिश्चर अमावस्या को भी श्रद्धालु भगवान की खास पूजा अर्चना करते हैं तथा इस दिन भी यहां विशेष धार्मिक माहौल रहता हैं। शनि जयंती के दिन ‘शनि शांति हवन-अभिषेक’ में केवल औषधि, तेल, घी, पंचामृत, फलों का रस व ईत्र का प्रयोग होता हैं। शनि जयंती की रात्रि में भगवान शनिदेव की प्रतिमा कालाग्री त्रिकाल स्वरूप का श्रृंगार कर काले वस्त्र व काले खाद्यान्नों का भोग लगाया जाता हैं। यहां विशेष बात यह भी हैं कि मंदिर में प्रतिमा के समक्ष तेल नहीं चढ़ाया जाता हैं। आमतौर पर पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शनिदेव की कोप दृष्टि से बचने के लिए तेल का दान किया जाता हैं किन्तु जोधपुर के इस अति-प्राचीन मंदिर में तेल, तिल, उड़द व लौह इत्यादि का दान नहीं लिया जाता हैं। यदि कोई श्रद्धालु जबरन चढ़ाता भी हैं तो उसे मंदिर प्रबंधन की ओर से गौशालाओं का भेंट कर दिया जाता हैं।

पूर्व में मंदिर श्मशान किनारे स्थापित था
जोधपुर का सबसे प्राचीन कहा जाने वाला ‘शनिश्चर थान’ मंदिर 200 वर्ष पूर्व श्मशान किनारे स्थापित था। मंदिर में वर्तमान पुजारी परमसुख वैष्णव पांचवी पीढ़ी हैं जो इस पावन धाम में सेवारत हैं। ‘शनिश्चर थान’ मंदिर का संचालन सुमेर मार्केट अनाज मंडी के व्यापारियों की ओर से निर्मित ‘शनिश्चर थान ट्रस्ट’ की ओर से किया जाता हैं। ट्रस्ट के वर्तमान अध्यक्ष दलपत डागा तथा सचिव पुखराज लोहिया हैं। व्यवस्थापक रामाराम पटेल के अनुसार मंदिर की बाउण्ड्री के बाहर वर्ष 1935 तक श्मशान था जो उम्मेद चिकित्सालय के निर्माण के बाद प्रतापनगर-सिवांची गेट मार्ग पर शिफ्ट कर दिया गया। मंदिर प्रांगण में विशाल कुआं भी हैं। ‘शनिश्चर थान’ मंदिर मुख्य गर्भ गृह के पासस राधा माधव, शिव परिवार, राम परिवार, जैन दादा गुरू एवं हनुमान जी का मंदिर भी हैं।

कभी किसान रात्रि विश्राम करते थे
करीब सात दशक पूर्व तक ‘शनिश्चर थान’ मंदिर में ग्रामीण अंचल से फसल बेचने हेतु आने वाले किसान रात्रि पड़ाव डालते थे। मंदिर के नजदीक सिवांची गेट प्रवेश का द्वार था जो शाम को बंद होने के बाद अगले दिन प्रात:काल ही खुलता था। किसान जोधपुर शहर में विलंब से पहुंचते थे, लिहाजा प्रवेश द्वार बंद होने की वजह से वे मंदिर प्रांगण के खुले परिसर में ही विश्राम करते थे।

Friday, 11 December 2015

भगवानसिंह परिहार‘बाऊ जी’: समाजसेवा क्षेत्र के महान कर्मयोगी/उपेक्षित बच्चों के पालनहार

घनश्याम डी रामावत
भगवानसिंह परिहार जिन्हें ‘बाऊ जी’/अनाथ-उपेक्षित बच्चों के पालनहार/बेसहारों का सहारा.. न जाने कितने नामों से ताउम्र पुकारा जाता रहा और आगे भी सदियों तक इसी नाम/अंदाज से जाना जाता रहेगा। सही मायने में उनका व्यक्तित्व/कर्मशीलता ही कुछ ऐसी थी कि उनकी समग्र/पूर्ण व्याख्या कर पाना अथवा उन्हें शब्दों में बांधते हुए कलमबद्ध कर पाना शायद संभव ही नहीं। सच्चे अर्थो में वे समाजसेवा क्षेत्र के श्रेष्ठतम कर्मयोगी थे। उन्हें समाजसेवा क्षेत्र का विशालतम वट वृक्ष भी कहा जाए तो कोई अति-श्योक्ति नहीं, एक ऐसा वट वृक्ष/जन-हितकारी पेड़ जो सदियों में ही उग पाता हैं। किसी ने सच कहा हैं.. ‘समाजसेवा’ अपने आप में सुनहरा शब्द हैं, किन्तु इसका सुनहरापन तभी संभव हो पाता हैं जब कोई नेक बंदा अपनी नेक नियती/अव्वल दर्जे की कर्मशीलता/बेहतर दायित्व निर्वहन से इसमें असली रंग भरता हैं। भगवानसिंह परिहार ईश्वर के ऐसे ही एक नेक बंदे/कर्मयोगी थे जिन्होंने अपने संपूर्ण जीवन में अपने द्वारा किए गए नेक कार्यो के जरिये न केवल स्वयं के जीवन की सार्थकता/व्यक्तित्व को श्रेष्ठतम मुकाम दिया, अपितु ऊंचे दर्जे के समाजसेवी/नेक बंदे के रूप में खुद को साबित करते हुए ‘समाजसेवा’ क्षेत्र को भी इंद्रधनुषी रंग प्रदान करते हुए वास्तविक सम्मान दिया।
जोधपुर सहित समूचे मारवाड़ अंचल में ‘बाऊ जी’ के नाम से प्रख्यात भगवानसिंह परिहार का जन्म 12 अक्टूबर 1928 को पिता रामसिंह परिहार के घर मातु श्री मानीदेवी की पवित्र कोख से हुआ। बीए-एलएलबी शिक्षा प्राप्त भगवानसिंह परिहार की संपूर्ण शिक्षा-दीक्षा उनके गृह नगर जोधपुर में ही हुई। 7 दिसम्बर 2015/मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष-एकादशी को 87 वर्ष की उम्र में भले ही उन्होंने अपनी देह त्याग दी, किन्तु वे आज भी समग्र समाज के साथ खासकर उन अनाथ/अवांछित/उपेक्षित बच्चों के दिलों में.. जिनको उन्होंने अपने जीवनकाल में विपरीत परिस्थितियों में अपनाकर परवरिश की/राह दिखाई, हमेशा जिंदा रहेंगे। आम तौर पर समाजसेवा क्षेत्र में लोग सुगम रास्ता चुनते हैं, किन्तु भगवानसिंह ने ऐसा नहीं कर.. एक ऐसा मार्ग चुना जो आसान नहीं था। उनके चुने हुए इसी मार्ग ने उन्हें जीते जी ही नहीं देह त्यागने के बाद भी एक श्रेष्ठतम मुकाम के साथ लोगों के दिलों में चिर-स्थायी बना दिया। उन्होंने ऐसे बच्चों के कल्याण का मार्ग चुना जिन्हें ‘अवांछित’ करार देकर माता-पिता तो त्याग ही देते हैं, कमोबेश भगवान भी अपना मुंह मोड़ लेते हैं। लोक लाज के भय के कारण उपेक्षा के भाव से लावारिश छोड़ दिए जाने वाले इन बच्चों को धरती के भगवान/कर्मयोगी भगवानसिंह परिहार ने अपनाना चालू कर दिया। हृदय से लगाया और उनके बेहतर जीवन निर्माण हेतु अपन सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।

ईश्वर की पवित्र रचना मानकर दिल से परवरिश
समाज जिन्हें हेय/घृणित दृष्टि से देखता हैं/ठुकराता हैं.. विधाता की परम/पावन/पवित्र रचना मानकर भगवानसिंह ने इन बच्चों को अपनाया। उनमें ईश्वर की पवित्र रचना का भाव महसूस कर उनकी दिल से परवरिश की। सचमुच! वर्षो पूर्व समाज में सोच व विचारों की विषमताओं के बीच इन बालकों को अपनाकर उन्हें अभिभावक का प्यार देना/पालन-पोषण और फिर उन्हें श्रेष्ठतम मुकाम प्रदान करना..आसान नहीं होता हैं। किन्तु ‘बाऊ जी’ को तो यही मार्ग अच्छा लगा, उन्होंने अपनी दृढ़ संकल्पशीलता के साथ न केवल जीवनभर अपने कदमों को इसी मार्ग पर आगे बढ़ाया अपितु पूरी तन्मयता से अपने दायित्वों को आत्मीयता/जिम्मेदारी से निभाया भी। उनकी इसी चिंतन पराकाष्ठा/दिव्य दृष्टि/त्याग/समर्पण ने उन्हें औरो से अलग बना दिया। उनके जीते जी व्यक्तिगत रूप से मेरा उनसे ज्यादा मिलना नहीं हुआ किन्तु 18 सितम्बर 2014 को उनके अपने कर्मक्षेत्र के निमित्त बनाई गई कर्मस्थली नवजीवन संस्थान/लव-कुश परिसर में ‘नि:शुल्क फैशन डिजायनिंग सर्टिफिकेट कोर्स’ शुभारम्भ/कार्यक्रम के दौरान हुई छोटी सी/क्षणिक मुलाकात ने मुझे उनसे/उनके चमत्कारिक व्यक्तित्व से रूबरू करा दिया। उम्र के इस पड़ाव पर भी ऊर्जा से सरोबार/सहृदयता/आत्मीयता/सौ फीसदी सेवा का भाव/ललक.. मैं तो कायल/स्तब्ध ही रह गया।

‘नवजीवन संस्थान’ के जरिये लोगों के जीवन में रोशनी
उनके द्वारा बनाई गई कर्म स्थली ‘नवजीवन संस्थान’ अंतर्गत लव कुश संस्थान/आस्था बाल शोभागृह/लव कुश बाल विकास केन्द्र/गायत्री बालिका विकास गृह.. के रूप में उनके द्वारा लगाए गए ऐसे सुनहरे वृक्ष हैं जिन्होंने अब तक न जाने कितनो के जीवन में रोशनी देते हुए उन्हें निहाल कर दिया, आगे भी वर्षो/सदियों तक ये वृक्ष उनकी प्रेरणा से अपनी छाया/वरदहस्त जरूरतमंदों को प्रदान करते रहेंगे। भगवानसिंह परिहार भले ही आज लोगों के बीच नहीं हैं, किन्तु सही अर्थों में नवजीवन संस्थान के रूप में आज भी सबके बीच मौजूद हैं। उनका जीवन सदैव लोगों के लिए, यहां तक कि समाज सेवा के क्षेत्र में कार्य कर रहे लोगों के लिए भी प्रेरणादायी रहेगा। उनका जरूरतमंद की टोह लेना/पहचानना, आवश्यकताओं का बारीकी से अध्ययन करना और सद् इच्छा/सद्भाव से उसे साकार/सार्थक रूप देना.. उस मसीहा में समाहित कुछ ऐसे गुण थे जो उन्हें सदैव आमजन के दिलों में चिर स्थायी बनाकर रखेंगे। किसी ने सही कहा हैं मान-सम्मान/उपाधि/पुरस्कार से इंसान स्वयं का धन्य बना सकता हैं किन्तु सेवा और सेवा का भाव(मय कर्मशीलता) इंसान को सही अर्थों में महान बनाती हैं। भगवानसिंह परिहार को अपने पूरे जीवन में बच्चों से प्यार/स्नेह रहा, खासकर ऐसे बच्चों से जिनके जीवन में अपने माता-पिता/अभिभावक के प्यार/दुलार की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं थी। सत्य तो यह हैं कि ताउम्र जागते-सोते उनके जीवन में बचपन ही हिलौरे लेते रहा जो शायद उनके इस संसार में नहीं रहते भी अनवरत रूप से जारी रहेगा।

कर्मशीलता की राजस्थान में और कोई मिसाल नहीं
दो दशक पूर्व भगवानसिंह परिहार की ओर से स्थापित लवकुश संस्थान में उन माताओं के बच्चों का लालन-पालन होता हैं जो न जाने किस मजबूरी में अपने बच्चों को सडक़ों के किनारे, निर्जन स्थल अथवा समाज की मर्यादा के डर से गंदी नालियों में फैंक देती थी। इन लावारिस बच्चों को कुत्तों द्वारा नोंचना और बीमार अपाहिज होने के समाचार पढ़ने के बाद दो दशक पूर्व परिहार ने उन बेकसूर बच्चों को संरक्षण देने की ठानी। नतीजतन उनकी ओर से स्थापित नवजीवन संस्थान में फेंके हुए और संस्थान में लाकर छोड़े गए निराश्रित 11 सौ से अधिक लावारिस बच्चों को नया जीवन मिला। उन्हीं 11 सौ बच्चों में 800 से अधिक संतानहीन दम्पित्तयों को गोद देकर बच्चों को समाज की मुख्यधारा में आने का अवसर मिला। यहीं नहीं, 100 से अधिक जरूरतमंद परिवार की बालिकाओं को शिक्षित कर उन्हें पुन: परिवार में भेजा गया। संस्थान की 11 बालिकाओं का धूमधाम से विवाह करवाया। 150 से अधिक वृद्धजन पाल रोड़(जोधपुर) स्थित ‘आस्था’ वृद्धाश्रम में सुखमय जीवन व्यतीत कर रहे हैं। जीवन में 25 हजार लोगों के नेत्र का ऑपरेशन, पांच हजार से अधिक विकलांगों को केलीपर, 65 कुष्ठ रोगियों को लिए पक्के मकान की व्यवस्था एवं 84 बाढ़ पीडि़तों के पुनर्वास के लिए पक्के मकानों की व्यवस्था उनके द्वारा की गई।

बच्चों से स्नेह/दुलार और सामाजिक सरोकार
बीए-एलएलबी भगवान सिंह की दिनचर्या ऐसी थी कि वे सुबह जल्दी ही हाउसिंग बोर्ड स्थित लव-कुश आश्रम बच्चों के पास पहुंच जाते और दिन भर वहां बिताते। शाम को पाल रोड़(जोधपुर) पर दिग्विजय नगर स्थित वृद्धाश्रम आ जाते और रात यहीं बिताते। समाजसेवा/सामाजिक सरोकारों को ही जीवन का उद्देश्य बना लेने वाले भगवानसिंह परिहार द्वारा ‘लव-कुश बाल विकास गृह’ के माध्यम से अनाथ शिशुओं का पालन-पोषण/गायत्री बालिका गृह में बालिकाओं को पढ़ाकर विवाह करवाना/आस्था वृद्धाश्रम में बुजुर्गों का संरक्षण/लॉयंस क्लब के माध्यम से अंधता निवारण में सहयोग/गांधी कुष्ठ निवारण संस्था में सहयोग/पश्चिमी राजस्थान में अकाल के दौरान सहायता/लूणी नदी में आई बाढ़ के बाद विस्थापितों का पुनर्वास/नेत्रहीन विकास संस्थान के भवन निर्माण में सहयोग तथा नशे व पोलियो के खिलाफ अभियान.. सहित किए गए जन-हितकारी कार्यो की फेहरिस्त इतनी लंबी हैं कि उसे कलमबद्ध करना शायद ही संभव हो। परिहार को बच्चों से अत्यधिक लगाव था। बच्चें स्कूल से आते हैं उन्हें घेर लेते थे। ‘बाऊजी’ भी अभिभावक की तरह रोजाना उनसे पढ़ाई के बारे में पूछते और उनकी कॉपियां चैक करते। ये बच्चे मानो परिहार के जेहन में बसे थे। अंतिम सांस लेने से पहले अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान बाइपास सर्जरी के बाद जैसे ही उन्हें होश आया, सबसे पहले यही बोले.. मुझे बच्चों से बात कराओ। वे बच्चों से दिल से स्नेह करते थे, इसी की मिसाल हैं कि उन्होंने अपने बालगृह में पली-बढ़ीं 12 लड़कियों के लिए न केवल वर ढूंढ़े.. धूमधाम से शादी करवाई और उनके गर्भवती होने पर डिलीवरी भी अपने घर पर ही करवाई।

अनुकरणीय समाजसेवा के लिए विभिन्न सम्मान
उत्कृष्ट समाजसेवी/कर्मयोगी भगवानसिंह  परिहार को उनकी अनुकरणीय कर्मशीलता के लिए वर्ष 2008 में राजस्थान सरकार की ओर से स्वतंत्रता दिवस पर मुख्यमंत्री द्वारा सम्मानित किए जाने के साथ ही राजस्थान सरकार की ओर से ही उनकी संस्था नवजीवन को पचास हजार रुपए की सम्मानित राशि, जोधपुर के पूर्व नरेश गजसिंह द्वारा 1 लाख 8008 रुपए देकर समाजसेवा के क्षेत्र में सम्मान, जोधपुर एसोसिएशन मुंबई द्वारा समाज रत्न अवार्ड, मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट द्वारा 2014 में मारवाड़ रत्न पुरस्कार एवं एमलीयर एसोसिएशन राजस्थान की ओर श्रेष्ठ नियोजक पुरस्कार प्रदान कर नवाजा जाना उनके बेहतर/उत्कृष्ट/श्रेष्ठतम व्यक्तित्व को स्वत: ही परिभाषित कर देते हैं।

सच्ची श्रद्धांजली/फफक पड़ी बालिकाएं
नवजीवन संस्थान की बालिकाएं अपने पालनहार ‘बाऊजी’ की पार्थिक देह को कंधा देते फफक पड़ी तो उपस्थित लोग भी परिहार की महानता के समक्ष नतमस्तक होते नजर आए। दो दशक में करीब 11 सौ से अधिक अनाथ बच्चों के पालनहार नवजीवन संस्थान के संस्थापक भगवानसिंह परिहार की अंतिम यात्रा में जोधपुर ही नहीं मारवाड़ अंचल के दूर-दराज इलाकों से हर वर्ग/समाज के लोग शामिल हुए। लवकुश शिशु गृह/वरिष्ठ नागरिक आस्था सदन परिवार के सदस्यों ने नम आंखों, भीगी पलकों व दु:खी मन से विदाई दी। उनके अंतिम दर्शन हेतु सामाजिक/धार्मिक/औद्योगिक/राजनीति क्षेत्र से हर आम व खास पहुंचा। कोई भी कार्य समय पर पूरा करने की प्रेरणा देने वाले भगवानसिंह परिहार की अंतिम यात्रा भी निर्धारित समय पर आरंभ हुई।

शत्-शत् नमन...
मनुष्य योनि में जन्म लेकर देवताओं के माफिक कार्य करना.. प्रत्येक कर्म को निस्पृह/निरीह/कामना रहित बनाए रखना और बिना यश/नाम/मान-सम्मान की इच्छा रखे परोपकार में सतत् तरीके से जीवनभर अपने आप को लीन रखना, यहीं भगवानसिंह परिहार ‘बाऊ जी’ अपनी असली पहचान थी। इस उम्मीद के साथ कि उनके द्वारा ताउम्र किए गए निष्काम भाव से दायित्व निर्वहन को समाज सकारात्मक लेते हुए अपने जीवन में आत्मसात करेगा और सही मायने में निरीह/उपेक्षित/पीडि़त/शोषित वर्गो को लेकर समाज के लोगों के मन मे उत्पन्न होने वाला यह सेवा का भाव ही भगवानसिंह परिहार जैसे उत्तम दर्जे के कर्मयोगी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। कर्मशीलता के पुरौधा/अवांछित/उपेक्षित बच्चों के पालनहार/समाजसेवी के रूप में विराट व्यक्तित्व.. श्रद्धेय भगवानसिंह परिहार को शत्-शत् नमन।

Wednesday, 9 December 2015

मौताणा प्रथा: आदिवासियों का अंधा कानून

घनश्याम डी रामावत
आधुनिक टेक्रोलोजी और मजबूत कानून व्यवस्था के दावों के बीच निरन्तर प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते इस देश में हमेशा से ही नागरिकों के धर्म/मजहब/रहन-सहन/आचार-विचार/कानून व्यवस्था के प्रश्र पर शत-प्रतिशत आजादी की बात की जाती रही हैं। आजाद होने के बाद देश की शिक्षा/तकनीक/कानून व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन हुआ हैं, निश्चित रूप से इन सबके चलते ही न केवल नागरिकों का जीवन पहले से बेहतर हुआ.. अपितु देश के साथ खास तौर से प्रदेशों की प्रगति भी अबाध तरीके से हुई हैं। इससे राजस्थान भी अछूता नहीं हैं, इस प्रदेश ने भी सुशासन/बेहतर कानून व्यवस्था/नागरिकों को स्वछंदता के साथ जीवन जीने की आजादी के दावों के बीच तरक्की के अपने अद्भुत आयाम स्थापित किए हैं। कमोबेश इसका दंभ भी प्रदेश की सरकारों द्वारा भरा जाता रहा हैं। इन सबके बीच यह वाकई अफसोसजनक/दुखद हैं कि देश.. खास तौर से राजस्थान के कुछ इलाकों में देश/प्रदेश की कानून व्यवस्था/संवैधानिक प्रक्रियाओं का खुलेआम मजाक उड़ाया जाता हैं। इन इलाकों में रह रहे लोगों के अपने रीति-रिवाज हैं.. अपना कानून और अपनी व्यवस्थाएं हैं। सीधे-सीधे कहा जाएं तो इनका अपना अंधा कानून हैं, जहां इनकी अपनी बनाई हुई दण्ड व्यवस्था तक हैं।

देश/प्रदेश की संवैधानिक/कानून व्यवस्थाओं को वर्षों से सीधे तौर पर ठेंगा दिखाते चले आ रहे इन स्वयं-भू लोगों/इलाकों के बारे में ऐसा नहीं हैं कि प्रदेश सरकार/कानून व्यवस्था/पुलिस को मालूम नहीं हैं.. सच तो यह हैं कि मालूम होते हुए भी ये स्वयं को असहाय महसूस करते हैं। जी हां! मैं बात कर रहा हूं.. राजस्थान के उन आदिवासी इलाकों की जहां आज भी उनकी अपनी व्यवस्थाएं हैं। फिर चाहे वह सामाजिक/आर्थिक/कानूनी.. सब कुछ संचालन/नियंत्रित करने का उनका अपना तरीका हैं। इन आदिवासी इलाकों में रहने वाले आदिवासियों की जिस प्रथा ने प्रदेश सरकार व कानून व्यवस्था का जिम्मा संभाल रहे लोगों की नाक में सबसे ज्यादा दम कर रखा हैं वह हैं ‘मौताणा’ प्रथा। एक ऐसी प्रथा जिसने अब तक हजारों परिवारों को तबाह/बर्बाद कर दिया हैं। राजस्थान की अरावली पर्वतमाला के आसपास/खास तौर से उदयपुर/बांसवाड़ा/सिरोही एवं पाली क्षेत्र के आदिवासी इलाकों में रहने वाले आदिवासियों के बीच इस प्रथा का सर्वाधिक चलन हैं। तथाकथित सामाजिक न्याय के उद्देश्य से शुरू हुई यह प्रथा अब कई परिवारों को तबाह कर देने वाली कुप्रथा का रूप ले चुकी हैं।  

आदिवासी ‘मौताणा’ प्रथा एक नजर में...
मौताणा प्रथा राजस्थान में उदयपुर/बांसवाड़ा/सिरोही एवं पाली क्षेत्र के आदिवासी इलाकों में जनजातीय समुदाय में प्रचलित हैं। ऐसी धारणा हैं कि इस प्रथा की शुरुआत तो सामाजिक न्याय के उद्देश्य से हुई थी जिसमें यदि किसी ने किसी व्यक्ति की हत्या कर दी तो दोषी को दंड स्वरूप हर्जाना देना पड़ता था लेकिन अब अन्य कारण से हुई मौत पर भी आदिवासी मौताणा मांग लेते हैं। वहीं पिछले कुछ सालों में देखा गया हैं कि किसी भी वजह से हुई अपनों की मौत का दोष दूसरे पर मढ़ कर जबरन मौताणा वसूल किया जाने लगा हैं। मौताणे की रकम नहीं मिलने पर आदिवासी चढ़ोतरा करते हैं। इसमें सामने वाले कुटुंब के घर को लूटा जाता हैं और आग तक लगा दी जाती हैं। चढ़ोतरा में दोषी पक्ष के साथ ही मारपीट की जाती हैं। दरअसल जब मृतक का परिवार किसी को दोषी मानकर उसे मौताणा चुकाने के लिए मजबूर करता हैं तो आदिवासियों की अपनी अदालत लगती हैं, जहां पंच दोषी को सफाई का मौका दिए बिना ही मौताणा चुकाने का फरमान जारी कर देते हैं। भुखमरी की नौबत झेल रहे आदिवासी परिवारों को लाखों रुपए का मौताणा चुकाना पड़ता हैं। जिससे गरीब आदिवासी बर्बाद हो जाते हैं।

‘मौताणा’ नहीं तो पीड़ित पक्ष को बदला लेने का हक
राजस्थान के प्रतापगढ़, भीलवाड़ा, चित्तौडगढ़, राजसमन्द और में भी मौताणा प्रथा का चलन हैं। ‘मौताणा’ नहीं चुकाने पर मृतक का परिवार दोषी परिवार के सदस्य की जान तक ले सकता हैं। राशि नहीं चुकाने पर यह हिंसक रूप लेता हैं। इसके अनुसार यदि आरोपी पक्ष पीड़ित पक्ष को मुआवजा नहीं देता हैं तो पीड़ित पक्ष को उससे बदला लेने का हक हैं। चूंकि मौताणे की रकम भारी भरकम होती हैं जिससे उनकी सारी जमीन जायदाद दांव पर लगानी पड़ जाती हैं। ऐसे में कई परिवार या तो डर कर पलायन कर जाते हैं या फिर बर्बाद हो जाते हैं। दूसरे पक्ष के इनकार करने पर पहला पक्ष दूसरे के घर में आग लगा सकता हैं या उसी तरह की वारदात को अंजाम दे सकता हैं। चाहे हादसा हो या हत्या या कुछ और आदिवासी किसी भी वजह से हुई मौत पर हर्जाना मांग लेते हैं। इसके अनेक उदाहरण हैं, मसलन.. उदयपुर के गल्दर में बाइक से हादसा हुआ तो उसे बिठाने वाले को 80 हजार देने पड़े। खाखड़ में की कउड़ी की बिजली गिरने से मौत पर पीहर ने मौताणा लिया। कुएं में शव मिला तो मालिक ने मौताणा मांगा। बाद में इसे लेकर काफी हंगामा भी हुआ। नवंबर 2005 में ढ़ेडमारिया के भैरूलाल डामोर की बीमारी से मौत हुई। चचेरे भाई से मौताणा लेने के लिए शव 35 दिनों घर में ही रखे रखा। मौताणा लेकर ही माने परिजन।

सवा साल लटका रहा शव/20 साल बाद लौटे 30 परिवार
कउचा गांव में महिला को सांप ने डसा लिया। पीहर वालों ने कहा कि सांप ससुराल का ही था। ऐसे ही महादेव नेत्रावला गांव में कुत्ते के काटने पर मालिकों से मौताणा लिया। नालीगांव में 1995 में हत्या के मामले में मौताणा ना चुकाने पर 30 परिवारों को गांव छोड़ना पड़ा था। बीस साल बाद ये घर लौट सके। गुजरात सीमा के आंजणी गांव में मौताणा नहीं मिलने पर अजमेरी का शव सवा साल तक पेड़ से लटका रहा। मांडवा के भाटा का पानी में 50 परिवार 14 साल से भटक रहे। कोर्ट ने भी आजीवन कारावास सुनाया फिर भी दूसरा पक्ष मौताणा राशि की मांग पर अड़ा हैं। कोटड़ा में 14 साल पहले हामीरा की दास्तान तो और भी अलग हैं। उसके घर के बाहर कोई शव फेंक गया। हामीरा के परिवार पर हत्या का आरोप लगा। खेत छोडक़र दूसरों के रहमो करम पर जिंदगी बसर करनी पड़ रही हैं। इसी प्रकार जोगीवड़ में अप्रैल 2014 परथा 50 देवा गरासिया की हत्या के बाद दूसरे पक्ष को झाल(अंतिम संस्कार की राशि) 90 हजार भरनी थी। इसके लिए 5 बीघा 6 बीघा जमीन गिरवी रखी। बाकी राशि ना देने पर करीब 30 परिवारों को पलायन करना पड़ा हैं। वर्ष 2010 में सुबरी के दिनेश की हत्या पर सात लाख मौताणा चुकाने के लिए एक पक्ष के झालीया ने 70, परथा ने 40, लक्ष्मण ने 20 झालीया ने 45 हजार में जमीन गिरवी रखी और मवेशी बेचे।

ताजा मामला कड़नवा(उदयपुर) का
प्रदेश का यह ताजा प्रकरण वाकई राजस्थान की तरक्की पर नाज करने वालों को बैचेन करने वाला हैं। उदयपुर जिले के कड़नवा गांव में हुई एक मौत जिन्दगी को शर्मिंदा कर रही हैं। कड़नवा के रहने वाले चालीस वर्षीय वेहता गमार की मौत दस दिन पहले हो गई हैं, किन्तु अब उसकी मौत के दस दिन बाद भी शव को सिर्फ इसलिए चिता मयस्सर नहीं हैं क्योंकि उसके गांव के पंचों को मौत का मुआवजा चाहिए। हैरानी यह हैं कि दस दिनों से सड़ रहे शव की दुर्गंध शासन-प्रशासन के फेफड़ो तक अभी तक नहीं पहुंची हैं। सचमुच जिंदगी के बाद मौत से ऐसी क्रूरता हिला देने वाली हैं। चरमराती ऐसी कानून व्यवस्था के लिए आखिर कौन जिम्मेदार हैं? क्या ये परम्पराएं अमानवीय नहीं? यह पहला मामला नहीं हैं, प्रदेश के इन आदिवासी इलाकों में इस प्रथा के चलते अनेक बार ऐसी स्थितियां बनी हैं। सवाल यह कि, आखिर प्रदेश सरकार/कानून व्यवस्था के जिम्मेदार पूरे मामले में ठोस कदम क्यों नही उठा रहे हैं? सचमुच पुलिस-प्रशासन की लाचारगी समझ से परे हैं।

Monday, 7 December 2015

राजस्थान की अद्भुत/नायाब ‘फड़’ परम्परा...

घनश्याम डी रामावत
रंग-बिरंगी संस्कृति वाले भारत देश में शुरू से ही कला का विशेष सम्मान रहा हैं। विभिन्न प्रदेशों की मिली जुली संस्कृति ने हमेशा ही देश को नायाब रंग दिया हैं। इसमें खासतौर से भारत की प्रर्दश्य कला और लोक नाट्यों का विशेष योगदान रहा हैं। अन्य प्रदेशों के अनुपात में शायद राजस्थान इस मामले में अग्रणी रहा हैं और यह प्रदेश अपनी वीरता के साथ अपने आर्ट व उसके प्रदर्शन को लेकर सदैव अन्य प्रदेशों के सरताज के रूप में जाना जाता रहा हैं। यहां की रंगमंच की परम्पराओं/लोक गाथाओं व लोक वार्ताओं की बात ही निराली हैं। बगड़ावत(देवनारायण) की महागाथा, पाबूजी, गोगाजी, तेजाजी, ढ़ोला-मारु, सैणी-बीजानन्द, रामू-चनणा, जेठवा-ऊजली, मूमल-महेन्द्र, बाघो-भारमली तथा दुरपदावतार जैसी अनेक लोक कथाएं हैं.. जिनके नामों के उच्चारण से ही जेहन में एक अद्भुत सिहरन सी दौड़ पड़ती हैं। सभी लोक कथाएं/आख्यान, प्रेम/सौन्दर्य/शौर्य व जीवटता से भरी पड़ी हैं। इसकी महत्ता को कुछ इस रूप में भी समझा जा सकता हैं कि असाधारण व्यवहारिक बुद्धि की धरोहर लिए सर्वसाधारण, इन लोक नाट्यों के माध्यम से सार्वजनिक चेतना के तौर पर उभरने वाली तस्वीर और महान विचारों प्राणवान/संस्कृति मानकर सहज ही ग्रहण/आत्मसात कर लेता हैं। हकीकत में यह लोक नाट्यों और उन्हें सम्पन्न करने वाली लोक मंडलियों में निहित वास्तविक शक्ति हैं। इन सब के बीच इस समय जिस आर्ट/लोक अभिव्यक्ति का जिक्र किया जा रहा हैं.. वह हैं ‘फड़’ अर्थात राजस्थान की सर्वाधिक रोमांचकारी/अद्भुत/अप्रतीम/लाजवाब/निराली परम्परा। अभिव्यक्ति और विचारों के साथ परिस्थितियों का ऐसा चित्रण/प्रदर्शन, जो आम जनमानस का समझाने में/उनके मन-मस्तिष्क में उतारने का अनूठा/अत्यधिक प्रभावशाली माध्यम समझा जाता हैं।

विशालकाय परदे पर लोक गाथाओं/नायकों का चित्रण
राजस्थान की जीवन शैली में लोक कलाकारों का बड़ा महत्व हैं। लोक कलाकार कटपुतली के खेल के जरिये जहां लोक गाथाओं का सजीव नाट्य रूपांतरण करते हुए लोगों का मन मोह लेते हैं वहीं भोपा(फड़ संचालक) कहे जाने वाले लोगों द्वारा फड़ बांचने की परम्परा सदियों से चली आ रही हैं। ‘फड़’ बांचने के अंतर्गत मूल रूप से भोपा लोग एक विशालकाय कपड़े के परदे पर जिस पर राजस्थान के लोक गाथाओं के नायको व पात्रों की कथाओं का चित्रण होता हैं.. एक ऐसे स्थान पर जहां लोगों का समूह बैठकर फड़ बांचने/प्रदर्शन का लुत्फ उठा सके, के सामने दीवार पर रखकर काव्य के रूप में लोक कथाओं के पात्रों के जीवन, संघर्ष, वीरता, बलिदान व जनहित में किए कार्यों का प्रस्तुतिकरण करते हैं। इस प्रस्तुतिकरण में भोपाओं द्वारा प्रस्तुत नृत्य व गायन का समावेश, इसे और अधिक लोकप्रिय बना देते हैं। आधुनिकता की आड़ में समय के साथ आज भले ही यह परम्परा पहले की भांति अधिक चलन/प्रचलन में नहीं हैं किन्तु राजस्थान के गांवों में लोगों के बीच/उनकी जीवन शैली में फड़ बंचवाने की परम्परा की गहरी छाप रही हैं। ज्यादातर गांवों में लोक देवता पाबू जी राठौड़ की फड़ बंचवाई जाती हैं। पाबू जी के अलावा भगवान देव नारायण जी की फड़ भी भोपा लोग बांचते आये हैं। भोपा लोगों द्वारा जागरण के रूप में नृत्य व गायन के साथ फड़ प्रस्तुत किए जाने को फड़ बांचना कहते हैं और इसके आयोजन को फड़ रोपना/फड़ बंचवाना कहते हैं। जैसा कि मैंने ऊपर जिक्र किया हैं.. मौजूदा दौर में फड़ के प्रति उदासीनता यह ‘फड़’ परम्परा सार्वजनिक रूप से कम होती जा रही हैं। संभव हैं आने वाले समय में यह परम्परा सिर्फ इतिहास के पन्नों में ही मिले। इस परम्परा में अत्यधिक लम्बाई युक्त विशाल फड़ का प्रयोग किया जाता हैं जिसमें लोक गाथा के पात्रों और घटनाओं का चित्रण होता हैं।

मान्यता के अनुसार ‘फड़’ परम्परा को देखना शुभ
विशालकाय चित्रण को सामने रख भोपागण काव्य के रुप में लोक कथा के पात्रों के जीवन, उनकी समस्याओं, प्रेम, क्रोध, संघर्ष, बलिदान, पराक्रम और उस जमाने में प्रचलित आंतरिक संघर्षों को उभारकर प्रस्तुत करते हैं। इस परम्परा में भोपें जल्दी-जल्दी एक स्थान से दूसरे स्थान तक चले जाते हैं। चित्रित फड़ को दर्शकों के सामने खड़ा तान दिया जाता हैं। भोपा गायक की पत्नी/सहयोगिनी लालटेन लेकर फड़ के पास नाचती-गाती हुई पहुंचती हैं और वह जिस अंश का गायन करती हैं, डंडी से उसे बजाती हैं। भोपा अपने प्रिय वाद्य ‘रावण हत्या’ को बजाता हुआ स्वयं भी इस दौरान नाचता-गाता रहता हैं। यह नृत्य गान समूह के रुप में होता हैं। दर्शक फड़ के दृश्यों से एवं सहवर्ती अभिनय से बहुत प्रभावित होते हैं। ‘फड़’ की इस परम्परा को देखना, इस शैली में विश्वास करने वाले परिवारों द्वारा अच्छा माना जाता हैं अर्थात इसे वर्ष की शुभ घटना माना जाता हैं। ‘फड़’ से सम्बन्धित दो लोकप्रिय चित्र गीत कथाएं ‘पाबूजी व देवनारायण जी की फड़े’ प्रसिद्ध हैं। पाबूजी राठौड़ महान लोक नायक हुए हैं। इनका जन्म आज से 700 वर्ष पूर्व का माना जाता हैं। पाबू जी की गाथा को राजस्थान में आज भी दर्शक बड़े चांव से सुनते और देखते हैं। हजारों की संख्या में उनके अनुयायी उन्हें कुटुम्ब के देवता के रूप में पूजते हैं। उनकी वीरता के गीत चारण और भाटों द्वारा गाए जाते हैं। मारवाड़ के भोपों ने पाबूजी की वीरता के सम्बन्ध में सैकड़ों लोकगीत रच डाले हैं और पाबूजी की शौर्य गाथा आज भी लोक समाज में गाई जाती हैं। पाबूजी की फड़ लगभग 30 फीट लम्बी तथा 5 फीट चौड़ी होती हैं। इसमें पाबूजी के जीवन चरित्र शैली को चित्रों में अनुपातिक तरीके से रंगों एवं रंग/फलक संयोजन के जरिए प्रस्तुत किया जाता हैं।

रावण हत्या/अपंग तथा जन्तर नामक वाद्यों का प्रयोग
फड़ को एक बांस में लपेट कर रखा जाता हैं और यह भोपा जाति के लोगों के साथ धरोहर के रुप में तथा जीविका साधन के रुप में भी चलता रहता है। पाबूजी की दैवी शक्ति में विश्वास करने वाले लोग प्राय: इन्हें निमंत्रण देकर बुलाते हैं। ऐसी मान्यता हैं कि ऐसा किए जाने से उनके बच्चें स्वस्थ रहेंगे तथा उनके परिवार पर किसी प्रकार का कोई कष्ट अथवा राक्षसी शक्तियों का प्रभाव नहीं रहेगा। पाबूजी के अलावा दूसरी लोकप्रिय फड़ ‘देवनारायण जी की फड़’ हैं। देवनारायण जी भी सोलंकी राजपूतों के पाबूजी की तरह वीर नायक थे। देवनारायण जी की फड़ के गीत, देवनारायण जी के भोपों द्वारा गाएं जातें हैं। ये भोपे गूजर जाति के हैं। ‘जन्तर’ नामक प्रसिद्ध लोकवाद्य पर भोपे इस फड़ की धुन बजाते हैं। राजस्थान में भोपों के कई प्रकार हैं। वे प्राय: ‘रावण हत्या’, ‘अपंग’ तथा ‘जन्तर’ नामक वाद्यों का प्रयोग करते हैं। ये भोपे भूमिहीन होतें है और अपनी जीविका के लिए उन्हें फड़ों के प्रदर्शन पर ही निर्भर रहना पड़ता हैं। प्रतिवर्ष विजय दशमी(दशहरा) के मौके पर रूणिचा के पास कोड़मदे गांव में एक बड़ा मेला लगता हैं। यह पाबूजी का मूल स्थान हैं। यहां आकर भक्तगण हजारों की संख्या में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। इस दौरान फड़ गायक भी एकत्र हो जाते हैं और सब मिलकर सामूहिक रुप से पाबूजी के गीत गाते हैं। भोपाओं द्वारा गाए जाने वाले गीतों में ‘बिणजारी ए हंस-हंस बोल, डांडो थारौ लद ज्यासी..’ आज भी लोगों में अत्यधिक लोकप्रिय हैं। ‘फड़’ आयोजन को सांस्कृतिक आयोजन बताते हुए कवियों द्वारा.. ‘परस्यों रात गुवाड़ी में पाबू जी की फडु रोपी, सारंगी पर नाच देखकर टोर बांधली गोपी। के ओले छाने सेण कर ही देकर आडी टोपी, के अब तो खुश होजा रूपियो लेज्या प्यारी भोपी।।’.. पंक्तियों के माध्यम से व्याख्या की गई हैं।

कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष के 11वें दिन से शुरूआत
कवियों द्वारा ‘इकतारो अर गीतड़ा जोगी री जागीर। घिरता फिरता पावणा घर-घर थारो सीर॥’ की रचना कर भोपाओं का भी बखान किया गया हैं। भोपागण जागरण के रूप में नृत्य और गान के साथ फड़ को बांचते हैं। यह प्रस्तुति प्रत्येक वर्ष कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष के 11वें दिन से शुरु की जाती हैं। इसके बाद साल भर तक भोपागण अलग-अलग जगहों पर जाकर फड़ कथा बांचते हैं। वर्षभर में केवल चौमासे(बरसात का महीना) में इस प्रस्तुति को रोक दिया जाता है। ऐसी धारणा हैं कि चौमासे में देवनारायण एवं अन्य देवतागण सो जाते हैं। इस महीने में फड़ों को खोलना भी वर्जित माना गया हैं। भोपाओं द्वारा केवल भक्तगणों के घरों में, देवनारायण/सवाई भोज के मन्दिर के प्रांगण में और जन समुदाय/सभा स्थल के सामने  ही ‘फड़’ की प्रस्तुति की जा सकती हैं। मोटे तौर पर कहा जा सकता हैं कि ‘फड़’ परम्परा राजस्थान की अति लोक परम्पराओं में से एक हैं जिसे आज वास्तव में वर्तमान पीढ़ी द्वारा तव्वजों दिए जाने की दरकार तो हैं ही प्रदेश सरकार के साथ केन्द्र की सरकार द्वारा भी प्रश्रय की अत्यधिक जरूरत हैं। अति प्राचीनतम ‘फड़’ एवं इसकी तरह की अनेक परम्पराएं जो आज इसकी जैसी स्थिति में हैं, वाकई सरकारी स्तर पर इनकी बेहतरी के लिए उठाए जाने वाले कदम न केवल इन परम्पराओं को जिंदा रखने/लोकप्रिय बनाने मे अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगे अपितु यह भारत की विविध/गंगा जमुनी संस्कृति का भी श्रेष्ठतम सम्मान होगा।

Sunday, 6 December 2015

श्री आई माता तीर्थ: जहां दीपक से काजल नहीं, केसर बनती हैं..!

घनश्याम डी रामावत

विश्व की बहुत बड़ी आबादी वाले भारत देश में भिन्न-भिन्न संस्कृति/धर्म/मजहब/जाति-सम्प्रदायों के बीच नागरिकों द्वारा अपने ईष्ट/ईश्वर/आराध्य के प्रति सच्ची अगाढ़ श्रद्धा/आस्था/भरोसा/इबादत का भाव रखते हुए कर्तव्य/कर्मशीलता के पथ पर आगे बढऩा.. शायद यहीं हमारी अपनी असली पहचान हैं। ‘राजस्थान’ भारत का वृहद/सांस्कृतिक राज्य हैं। वीरता के लिए विख्यात इस प्रदेश में ही एक कस्बा हैं ‘बिलाड़ा’। राजस्थान के अन्य शहरों/भागों का जिस तरह अपना एक आश्चर्यजनक/अतुल्य इतिहास हैं, बिलाड़ा का भी अपना ऐतिहासिक/धार्मिक महत्व हैं। बिलाड़ा कस्बा मुख्य रूप से अपने विविध धार्मिक स्थलों/चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध हैं। विश्व का ये एक मात्र ऐसा स्थान हैं जहां पिछले करीब पांच सौ से भी अधिक वर्षों से अखंड ज्योत जल रही हैं एवं इस अखंड ज्योत से केसर प्रकट होता हैं.. अर्थात जल रहे दीपक से काजल नहीं, केसर बनती हैं। जी हां! मैं बात कर रहा हूं, जोधपुर जिले के बिलाड़ा में स्थित सीरवी समाज की प्रमुख आराध्य देवी ‘श्री आई माता’ तीर्थ/धार्मिक स्थल की।


सीरवी समाज के लोगों की आराध्य देवी(कुल देवी)
जोधपुर से 80 किलोमीटर दूर जोधपुर-जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित बिलाड़ा कस्बा श्री आई माता जी की पवित्र नगरी के रूप में संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध हैं। यहां श्री आई माता जी का विश्व विख्यात तीर्थ/मंदिर हैं, जहां अनगिनत श्रद्धालु पहुंचते हैं और अपना मस्तक झुकाते हुए अपनी खुशहाली की दुआ/मन्नत मांगते हैं। वैसे तो ‘आई माता जी’ सीरवी समाज की प्रमुख आराध्य देवी हैं किन्तु यह शायद आई माता जी के चमत्कारों/लोगों की उनके प्रति अनन्य श्रद्धा/आस्था/भक्ति भाव का ही परिणाम हैं कि यहां पूरे भारतवर्ष से छत्तीस कौम/धर्मों के लोग दर्शनों के लिए पहुंचते हैं। आई माता को नवदुर्गा(देवी) का अवतार माना गया हैं। ऐसी मान्यता हैं कि ‘आई माता जी’ ने एक नीम के वृक्ष के नीचे अपना पंथ चलाया था जो अब आईमाता का पूजा स्थल/थान/बडेर कहलाता हैं। इस स्थान पर उनकी कोई मूर्ति नहीं हैं। जैसा कि पूर्व में जिक्र किया जा चुका हैं ‘आई माता जी’ मूल रूप से सीरवी समाज/जाति के लोगों की आराध्य देवी(कुल देवी) हैं, जो क्षत्रियों से निकली एक कृषक जाति हैं। बिलाड़ा स्थित ‘आई माता जी’ के मंदिर में दीपक की ज्योति से केसर निर्माण.., ने इस तीर्थ/धार्मिक स्थल को विश्व पटल पर प्रमुख पहचान दे दी हैं। सीरवी समाज के लोग ‘आई माता जी’ के मंदिर को दरगाह कहते हैं।

प्रतिमाह शुक्ल पक्ष-द्वितीया को विशेष पूजा-अर्चना
धार्मिक स्थल पर माह की शुक्ल पक्ष-द्वितीया को विशेष पूजा-अर्चना होती हैं जिसमें न केवल सीरवी समाज के लोग प्रमुखता से शामिल होतेे हैं अपितु अन्य धर्मो/समाजों के लोग भी भारी तादाद में शिरकत करते हैं। स्पष्ट रूप से तो यह किसी को भी ज्ञात नहीं अर्थात उल्लेख नहीं कि ‘आई माता जी’ मूल रूप से कहां से थी और वे किस तरह उनका बिलाड़ा आगमन हुआ? किन्तु अलग-अलग धारणाओं के अनुसार वे मुल्तान और सिंध की ओर से आबू और गौड़वाड़ क्षेत्र से होती हुई बिलाड़ा आई तथा एक नीम के वृक्ष के नीचे इन्होंने अपना पंथ चलाया। एक अन्य धारणा के अनुसार उन्होंने गुजरात के अम्बापुर में अवतार लिया था और अम्बापुर में अनेक चमत्कारों के पश्चात वे देशाटन करते हुए बिलाड़ा पधारी। यहां पर उन्होंने भक्तों को 11 गुण व सदैव सन्मार्ग पर चलने के उपदेश दिए। ऐसी मान्यता हैं कि आई माता जी द्वारा बताए हुए मार्ग पर आज भी सीरवी समाज के लोग चलते हैं एवं उनके उपदेशों का पालन करते हैं। एक दिन आई माता जी ने अपने भक्तों के समक्ष स्वयं को अखंड ज्योति में विलीन कर दिया। इसी अखंड ज्योति से केसर प्रकट होता हैं जो आज भी तीर्थ स्थल/मंदिर में उनकी उपस्थिति का साक्षात प्रमाण समझा जाता हैं।

मंदिर में प्रवेश करते ही अद्भुत संतोष/सुकून की अनुभूति
आज जिस स्थान पर ‘आई माता जी’ का भव्य मंदिर हैं, ऐसी मान्यता हैं कि इसी स्थान पर माता जी अपने इष्ट देव की पूजा-अर्चना किया करती थी। ‘आई माता जी’ के ज्योर्तिलीन होने के बाद उनकी इच्छानुसार उनकी फोटो/चित्र की स्थापना की गई। विश्व का संभवत: पहला मंदिर हैं जो केवल फोटो/चित्र की पूजा होती हैं। जैसा कि श्रद्धालु बताते हैं, ‘आई माता जी’ के आशीर्वाद से ही राजस्थान सरकार में मंत्री रहे माधवसिंह इस धार्मिक स्थल के दीवान बने। संगमरमर से बने तीर्थ स्थल/मंदिर की भव्यता देखते ही बनती हैं। मुख्य दरवाजा पार कर जैसे ही मंदिर में प्रवेश करते हैं, मन में अद्भुत संतोष/संतुष्टि/सुकून का भाव उत्पन्न होता हैं.. प्रतीत होता हैं स्वर्ग में आ गए हैं। मंदिर के मुख्य द्वार पर संगमरमर पर की गई नक्काशी वाकई देखने लायक हैं। चांदी के किवाड़, सोने के छत्र, आई माता जी की गादी(जिस पर आई माता जी विराजमान होती हैं).. अद्भुत/अप्रतीम। तीर्थ स्थल पर प्रात: चार बजे मंगला आरती और सायं सात बजे संध्या आरती होती हैं।

परिसर के एक भाग में विशाल/भव्य संग्रहालय
मंदिर परिसर के प्रथम तल पर आई माता जी की झोपड़ी को संरक्षित किया हुआ हैं। यह वही झोपड़ी हैं जहां ‘आई माता जी’ निवास करती थी। तीर्थ स्थल/मंदिर के एक भाग में आई माता जी के संपूर्ण जीवन चरित्र को दर्शाने वाली भव्य प्रदर्शनी हैं। यहां आई माता जी के जीवन वृत्त एवं विभिन्न घटनाओं को अनेक चित्रों के माध्यम से उद्धत गया हैं। प्रदर्शनी के अंतिम छोर पर परम भक्त दीवान रोहित दास की धूणी हैं, जहां वे तपस्या करते थे। तीर्थ स्थल/ मंदिर परिसर के एक भाग में विशाल एवं भव्य संग्रहालय हैं। यहां सैंकडों साल पुरानी अनेक वस्तुएं, बर्तन, वाद्य यन्त्र, पुराने दस्तावेज, फर्नीचर, धातु की मूर्तियां, कलाकृतियां एवं पुरानी तकनीकी वस्तुएं संरक्षित हैं। इसी म्यूजियम में अनेक प्रकार के हथियार जैसे तलवारें, कटार, भाले व ढ़ाल आदि भी संरक्षित किये गए हैं। श्रद्धालुओं की माने तो वर्तमान दीवान माधव सिंह द्वारा इस धार्मिक स्थल के संरक्षण पर खास ध्यान दिया गया हैं। धार्मिक स्थल के मौजूदा स्वरूप को देखकर वाकई बेहतरीन संरक्षण/प्रबंधन केे लिए दिल से धन्यवाद/आभार ज्ञापित करने का दिल करता हैं।

बेहतरीन स्थापत्य कला/उत्कृष्ट नक्काशी
मंदिर परिसर के द्वार के पास ऊपर रावटी झरोखा बना हुआ हैं। यह पत्थर पर नक्काशी का सुन्दर उदाहरण हैं। इस झरोखे के अन्दर की तरफ कांच की अत्यंत सुन्दर कारीगरी की गई हैं। बेजोड़ स्थापत्य कला युक्त यह झरोखा बरबस ही सबका ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करता हैं। धार्मिक स्थल में वाड़ी महल भी अद्भुत हैं। यह महल धार्मिक स्थल के दीवान माधव सिंह का निवास स्थान हैं। इसका निर्माण लगभग तीन सौ वर्षों पहले हुआ था। इस महल की बनावट भी बेजोड़ हैं।  

सीरवी समाज का संक्षिप्त परिचय
‘सीरवी’ एक क्षत्रिय कृषक जाति हैं जो आज से लगभग 800 वर्ष पूर्व राजपूतों से अलग होकर राजस्थान के मारवाड़ व गौडवाड़ क्षेत्र में रह रही थी। कालान्तर में यह लोग मेवाड़ व मालवा सहित देश के अन्य भागों में फैल गए। वर्तमान में सीरवी समाज के लोग राजस्थान के अलावा मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, दमन दीव, पांडिचेरी सहित देश के अन्य इलाकों में बड़ी तादाद में रह रहे हैं। सीरवी समाज के इतिहास का वैसे तो बहुत कम प्रमाण उपलब्ध हैं किन्तु इतिहास के जानकारों की माने तो जालोर में खारडिय़ा राजपूतों का शासन(राजा कान्हड़देव चौहान)। उन्ही के वंश 24 गौत्रीय खारडिय़ा सीरवी कहलाए। सीरवी समाज के कुल 24 गौत्र हैं जो इस प्रकार हैं-राठौड़, सोलंकी, गहलोत, पंवार, काग, बर्फा, देवड़ा, चोयल, भायल, सैणचा, आगलेचा, पडिय़ार, हाम्बड़, सिन्दड़ा, चौहान, खण्डाला, सातपुरा, मोगरेचा, पडिय़ारिया, लचेटा, भूंभाडिय़ा, चावडिय़ा, मूलेवा और सेपटा। सीरवी समाज का जीवन मूल रूप से कृषि प्रधान ही हैं किन्तु समय के साथ अब इस समाज के बहुत बड़े वर्ग ने व्यापार/सरकारी-निजी सेवा की ओर अपना रूख अख्तियार कर लिया हैं अर्थात जीविकोपार्जन का माध्यम बना लिया हैं।

‘आई माता जी’ तीर्थ स्थल/मंदिर जोधपुर से 80 किमी दूर
बिलाडा कस्बा जोधपुर से 45 किमी दूर जोधपुर-जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित हैं। जयपुर, अजमेर, जोधपुर से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता हैं। ‘आई माता जी’ तीर्थ स्थल/मंदिर पहुंचने के लिए जोधपुर से बस, जीप व टैक्सियां आसानी से मिल जाती हैं। वर्ष में दो बार नवरात्रा के दौरान चैत्र माह में इस तीर्थ स्थल/मंदिर पर विशाल मेला भी लगता हैं। इस अवसर पर श्रद्धालुओं की यहां भारी तादाद रहती हैं। लोग यहां पहुंचकर ‘आई माता जी’ के समक्ष अपनी पीड़ाओं का जिक्र करते हुए अपने लिए खुशहाली/कामयाबी की दुआ करते हुए मन्नत मांगते हैं। बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए धर्मशालाओं की यहां उत्तम व्यवस्था हैं। 

उज्जैन का ‘अखंड ज्योति’ मंदिर: हनुमान जी की सिंदूरी प्रतिमा भक्तों के आकर्षण का केन्द्र

घनश्याम डी रामावत
महाकाल की नगरी उज्जैन अर्थात मध्य प्रदेश का ऐसा शहर जो अपनी विविधताओं के लिए देश ही नहीं विश्वभर में अपनी विशेष पहचान रखता हैं। यहां के अखंड ज्योति मंदिर में राम भक्त हनुमान जी की मूर्ति से लेकर उनको पूजने का विधि-विधान.. सब कुछ ही निराला हैं। जहां एक तरफ हनुमान जी की सिंदूरी प्रतिमा भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं, वहीं पांव के नीचे दबी लंकिनी राक्षसी उनके पराक्रम की कहानी सुनाती हैं। ऐसी धारणा हैं कि श्रीराम अनुज लक्ष्मण जी को बचाने के लिए जब हनुमान जी संजीवनी लेकर आ रहे थे तो लंकिनी नाम की राक्षसी ने उनका रास्ता रोक कर उन्हें जाने से रोका, जिसके बाद हनुमान जी लंकिनी को अपने पैरों के नीचे दबाकर आगे बढ़ गए थे। इस मंदिर में राम भक्त हनुमान/महावीर/बजरंग बली के उसी रूप के दर्शन होते हैं, जहां आज भी हनुमान जी के पैरों तले लंकिनी विराजमान हैं।

अखंड दीये में चमत्कारी शक्तियां समाहित
अखंड ज्योति मंदिर में खास साज श्रृंगार के साथ बाल ब्रह्मचारी हनुमान जी का ये रूप वाकई मनमोहक हैं। दक्षिणामुखी हनुमान जी की इस प्रतिमा में उनके एक हाथ में संजीवनी तो कंधे पर गदा सुशोभित हैं। ऐसी मान्यता हैं कि हाथों में बाजू-बंद, पांव में पायजेब और कलाई में कड़े पहने हुए बजरंग बली के दिव्य रूप के दर्शन मात्र से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। मंदिर के नाम के अनुरूप ही यहां जलता अखंड दिया भक्तों को बजरंग बली के चमत्कार की कहानी सुनाता हैं। वैसे तो देखने में ये मंदिर हनुमान जी के अन्य मंदिरों की तरह ही हैं लेकिन मंदिर में सालों से जल रहे अखंड दीये में बजरंग बली की चमत्कारी शक्तियां समाहित हैं। कहते हैं साढ़े साती से परेशान भक्त अगर इस मंदिर में आकर इस अखंड दीये के दर्शन कर लें और मंदिर में आटे का एक दीया जला दें तो शनि के प्रकोप से मुक्ति मिलते देर नहीं लगती।

यहां लगाया जाता हैं अखरोट के प्रसाद का भोग
भक्त हनुमान जी को यहां कई तरह के प्रसाद चढ़ाते हैं। जन-जन की श्रद्धा/आस्था के केंद्र इस मंदिर में भक्त अपनी मनोकामना प्रसाद के माध्यम से लेकर आते हैं। अगर किसी को झगड़े, मकदमों से छुटकारा चाहिए तो एक नारियल के अर्पण मात्र से उसके तमाम कष्टों का निवारण हो जाता हैं। ठीक उसी तरह जिन भक्तों को संतान की कामना हैं वो अपनी शक्ति और भक्ति के अनुसार एक, दो या पांच किलो तेल अखंड ज्योति में चढ़ाने का संकल्प लेते हैं। चना-चिरौंजी से प्रसन्न होने वाले हनुमान जी को यहां विशेष तौर से अखरोट के प्रसाद का भोग लगाया जाता हैं। ऐसी धारणा हैं कि जिन भक्तों की मन्नत पूरी होती हैं वो यहां आकर आटे में गुड़ मिलाकर रोट का प्रसाद तैयार करते हैं और बजरंग बली को भोग लगाते हैं। मंदिर में प्रतिदिन होने वाली आरती का गवाह बनने के लिए बड़ी संख्या में भक्तों का सैलाब उमड़ता हैं।

मंगलवार और शनिवार को पूजा से विशेष लाभ
मान्यता हैं कि इस मंदिर में हनुमान जी की प्रतिमा संग उनकी दायीं ओर रखी हुई चंदन की गदा के दर्शन करने से बल, विद्या और बुद्धि का वरदान प्राप्त होता हैं। विश्व पटल पर अपनी गंगा-जमुनी संस्कृति/अनेकों विविधताओं को समाहित करते हुए विशेष मुकाम रखने वाले भारत के प्रमुख राज्य मध्यप्रदेश के इस मंदिर ने निश्चित रूप से अपनी धार्मिक/पौराणिक मान्यताओं के चलते उज्जैन ही नहीं देश को भी खास पहचान दी हैं। मंदिर में देशभर से उमड़ते भक्तों के सैलाब को देखकर यह कहा जा सकता हैं कि इस मंदिर के प्रति लोगों की जबरदस्त आस्था हैं। यहां अनंत आस्था से श्रद्धालु पवन पुत्र से विनती करते हैं और जैसा कि उनकी मान्यता हैं, हनुमान जी उनकी पुकार को सुनते हुए कल्याण करते हैं। धारणा के अनुसार मंगलवार और शनिवार को अखंड ज्योति मंदिर में पूजा करने से विशेष लाभ प्राप्त होता हैं।

Saturday, 5 December 2015

मेहरानगढ़ दुर्ग में विराजित जोधपुर की रक्षक ‘मां चामुण्डा’

घनश्याम डी रामावत
सूर्यनगरी के मेहरानगढ़ दुर्ग में स्थित जन-जन की आस्था व श्रद्धा की प्रतीक मां चामुण्डा की मूर्ति जोधपुर के संस्थापक राव जोधा ने 556 वर्ष पूर्व विक्रम संवत् 1517 में मण्डोर से लाकर स्थापित की थी। चामुण्डा मूल रूप से परिहारों की कुल देवी हैं। राव जोधा ने जब मण्डोर छोड़ा, तब चामुण्डा को अपनी ईष्टदेवी के रूप में स्वीकार किया था। जोधपुर के वाशिंदों में मां चामुण्डा के प्रति जबरदस्त आस्था हैं। मां को लेकर उनकी धारणा यह भी कि सन् 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान गिरने वालों बमों को मां चामुण्डा ने अपने आंचल का कवच पहना दिया था। लोक मान्यता के अनुसार मेहरानगढ़ दुर्ग व जोधपुर के कुछ हिस्सों पर कई बम गिराए गए किन्तु कोई जनहानि अथवा नुकसान नहीं हुआ। जोधपुर के वाशिंदें आज भी इसे मां चामुण्डा की कृपा ही मानते हैं।

अतीत का भी एक उदाहरण भी बड़ा दिलचस्प हैं जब 9 अगस्त 1857 को दुर्ग में गोपाल पोल के निकट बारूद के ढ़ेर पर बिजली गिरने से चामुण्डा मन्दिर कण-कण होकर उड़ गया, किन्तु मां चामुण्डा की मूर्ति अडिग रही/सुरक्षित रही। तबाही इतनी अधिक थी कि इसमें करीब तीन सौ लोग मारे गए थे। मुख्य द्वार का विधिवत निर्माण महाराजा अजीतसिंह ने करवाया था। मन्दिर में मां लक्ष्मी, महा-सरस्वती व बैछराज जी की मूर्तिया स्थापित हैं। मां चामुण्डा के मन्दिर में प्रतिवर्ष भादवा माह की शुक्ल पक्ष की तेरस को मन्दिर जीर्णाेद्वार दिवस मनाया जाता हैं।

मण्डोर से लाई गई थी मां की प्रतिमा
राव जोधा ने मां चामण्डा की मूर्ति को मण्डोर से लाकर मेहरानगढ़ दुर्ग में स्थापित किया था। जोधपुर की रक्षक आद्य शक्ति मां चामुण्डा से ‘गढ़ जोधाणे ऊपरे बैठी पंख पसार, अम्बा थ्हारों आसरो तूं हीज हैं रखवार..’ एवं ‘चावण्ड थ्हारी गोद में खेल रयो जोधाण,निगे राखजै, थ्हारा टाबर जाण..’ पंक्तियों के माध्यम से स्तुति की गई हैं कि जोधपुर के किले पर पंख फैलाने वाली माता तू ही हमारी रक्षक हैं। मारवाड़ के राठौड़ वंशज श्येन(चील) पक्षी को मां दुर्गा/चामुण्डा का दूसरा स्वरूप मानते हैं। यहीं कारण हैं कि मारवाड़ के राजकीय झण्डे पर भी मां चामुण्डा/दुर्गा स्वरूप चील का चिन्ह ही अंकित रहा हैं। ऐसी मान्यता हैं कि मेहरानगढ़ दुर्ग के निर्माता जोधपुर के संस्थापक राव जोधा के राज्य छिन जाने के 15 वर्ष बाद मां चामुण्डा/दुर्गा ने स्वप्र में आकर उन्हें चील के रूप में दर्शन दिए और कामयाबी का आशीर्वाद दिया। राव जोधा ने स्वप्र में मिले दिशा-निर्देशों का अनुसरण किया और देखते ही देखते उनका राज्य पुन: कायम हो गया। करीब 556 वर्ष पहले मेहरानगढ़ दुर्ग निर्माण के समय से ही मां चामुण्डा/दुर्गा रूप में चीलों को चुज्गा देने की परम्परा शुरू की, जो सदियों बाद भी उनके वंशज अनवरत रूप से जारी रखे हुए हैं। कहा जाता हैं कि राव जोधा को मां चामुण्डा ने आशीर्वाद में कहा था कि जब तक मेहरानगढ़ दुर्ग पर चीलें मंडराती रहेंगी, तब तक दुर्ग पर किसी भी प्रकार की कोई विपत्ति नहीं आएगी।

बदल चुकी हैं अनेक परम्पराएं
करीब सात वर्ष पूर्व वर्ष 2008 में मेहरानगढ़ दुर्ग में हुई दुखांतिका के बाद मन्दिर में अनेक परम्पराएं बदल जा चुकी हैं। दुखांतिका में करीब 250 लोग काल कवलित हुए थे। खुद के आशियाने की कामना रखने वाले श्रद्धालु चामुण्डा के दर्शन के बाद बसंत सागर में पड़े पत्थरों से छोटा घर बनाते थे, लेकिन अब ऐसी कोई परम्परा नजर नहीं आती हैं। सालमकोट मैदान में लगने वाला नवरात्रा मेला व मन्दिर की परिक्रमा भी बंद हो चुकी हैं। यहां नवरात्रा की प्रतिपदा को महिषासुर के प्रतीक भैंसे की बलि देने की परम्परा थी, जो रियासतों के भारत गणराज्य में विलय और पशु क्रूरता अधिनियम लागू होने के बाद बंद कर दी गई।