Sunday, 29 November 2015

जोधपुर का ‘राजरणछोड़ जी मंदिर’: श्रद्धा व आस्था की अनूठी मिसाल

घनश्याम डी रामावत
जोधपुर के प्रमुख श्रीकृष्ण मंदिरों में शुमार राजरणछोड़ जी का मंदिर जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह की द्वितीय रानी एवं जामनगर के राजा वीभा की पुत्री जाड़ेची राजकंवर ने बनवाया। सन् 1905 में बने इस मंदिर पर रानी राजकंवर ने कुल एक लाख रूपये खर्च किए। मात्र नौ वर्ष की उम्र जाड़ेची राजकंवर का विवाह जोधपुर के तत्कालीन राजकुमार जसवंतसिंह के साथ हुआ था। वर्ष 1854 में यह ‘खाण्डा’ विवाह था जिसमें जसवंतसिंह विवाह के लिए जामनगर नहीं गए बल्कि सिर्फ उनकी तलवार को वहां भेजा गया। तलवार के साथ राजकुमारी राजकंवर ने सात फेर लिए थे। विवाह की कुछ रस्में जालोर में पूरी की गई। विवाह के बाद राजकंवर जोधपुर पहुंची लेकिन चंद दिनों बाद जामनगर लौट गई। जब वह तेरह वर्ष की हुई तब पुन: ससुराल जोधपुर आई तो फिर कभी लौटकर अपने पीहर नहीं गई। एक बार मेहरानगढ़ में प्रवेश करने के बाद वह जीवन भर दुर्ग से बाहर नहीं निकली। रानी राजकंवर प्रतिवर्ष सवा लाख तुलसी दल अभिषेक के लिए द्वारिका भेजती थी। तुलसी दल को पुजारी तथा कामदार द्वारिका लेकर जाते थे।
 महाराजा जसवंतसिंह के विक्रम संवत् 1952 में देहावसान के बाद रानी राजकंवर ने वृद्धावस्था में जोधपुर में भगवान श्रीकृष्ण का भव्य मंदिर बनवाया। उस समय यह मंदिर जोधपुर परकोटे के बाहर बाई जी का तालाब के पास एक ऊंचे रेतीले टीले पर बनवाया गया। जोधपुर रेलवे स्टेशन के ठीक सामने स्थित मंदिर की जमीन को तीस फीट ऊंचा बनाया गया ताकि रानी राजकंवर मेहरानगढ़ की प्राचीर से भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन कर सकें। रानी ने अपने संपूर्ण जीवन में कभी दुर्ग की प्राचीर नहीं लांघी। मंदिर के निर्माण के बाद रानी किले की प्राचीर से ही संध्या के समय खड़ी होकर दर्शन करती थी। मंदिर का पुजारी आरती की ज्योत को मंदिर के चौक के दरवाजे के बाहर लेकर खड़ा होता था। किले की प्राचीर से रानी राजकंवर उसी ज्योत के दर्शन करती थी। स्वयं रानी राजकंवर कभी मंदिर में दर्शनार्थ नहीं पहुुंची।

यूं पड़ा मंदिर का नाम ‘राजरणछोड़’
रानी राजकंवर के आराध्य भगवान श्रीकृष्ण को रणछोड़ भी कहा जाता हैं। रानी ने अपने नाम राज के साथ अपने आराध्य भगवान श्रीकृष्ण अर्थात रणछोड़ का नाम जोडक़र मंदिर का नाम ‘राजरणछोड़ जी मंदिर’ रखा। रानी राजकंवर के पुत्र महाराजा सरदारसिंह की मौजूदगी में 12 जून 1905 के दिन मंदिर को भक्तों के दर्शनार्थ खोला गया। मंदिर के नीचे वाले भाग में कई कोटडिय़ां बनाई गई जो अब दूकानों की शक्ल अख्तियार कर चुकी हैं। बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को आवासीय सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से एक सराय का निर्माण करवाया गया जो आज भी विद्यमान हैं। इस सराय को जसवंत सराय के नाम से जाना जाता हैं, यह सराय ‘राजरणछोड़ जी मंदिर’ के ठीक सामने रेलवे स्टेशन जाने वाले मुख्य मार्ग पर बायी ओर गली में स्थित हैं।

लाल पत्थर से निर्मित कलात्मक तोरण द्वार
‘राजरणछोड़ जी मंदिर’ का मुख्य द्वार कलात्मक हैं। लाल पत्थर से निर्मित दो विशाल स्तंभ से सुसज्जित स्तंभों पर बेल बूटों तथा सुंदर फूल पत्तियों की खुदाई सहित शीष से दोनों स्तंभों को जोडऩे वाले मेहराब का आकर्षण देखते ही बनता हैं। मंदिर के अग्र भाग के दोनों सिरों पर कलात्मक छतरियां और मुख्य द्वार से लगभग तीस सीढिय़ां पूरी होने के बाद एक तोरण द्वार निर्मित हैं। सीढिय़ों के दोनों ओर खुले स्थल पर बारादरियां हैं। मंदिर के गर्भ गृह में काले मकराना पत्थर को तराश कर बनाई गई भगवान श्री रणछोड़ जी की प्रतिमा स्थापित हैं।

चांदी के झूले में श्रावणोत्सव
वर्तमान में देव स्थान प्रबंधित राजकीय प्रत्यक्ष प्रभार मंदिर में जन्माष्टमी, अन्नकूट तथा श्रावण मास में झूलों का आयोजन होता हैं। श्रावण मास में विशाल चांदी से निर्मित झूले में ठाकुर जी का विराजित कर दर्शनार्थ रखा जाता हैं। मंदिर के पुजारी हरिलाल शिवलाल ठाकर के अनुसार उनके परदादा रानी राजकंवर के साथ दहेज में आए थे। मंदिर में पहले वर्ष भर में कुल 21 ठाकुर जी के उत्सव होते थे, किन्तु समय के साथ इनमें कमी आई हैं। ‘राजरणछोड़ जी मंदिर’ में भगवान श्रीकृष्ण के दर्शनार्थ मारवाड़ भर से तो श्रद्धालु पहुंचते ही हैं, देश के विभिन्न प्रदेशों के अलावा विदेश से भी भारी तादाद में लोग पहुंचते हैं। 

Friday, 27 November 2015

श्री गुरू नानक देव: एक अलौकिक अवतार पुरूष

घनश्याम डी रामावत
भारत की पावन भूमि पर कई संत-महात्मा अवतरित हुए हैं, जिन्होंने धर्म से विमुख सामान्य मनुष्य में अध्यात्म की चेतना जागृत कर उसका नाता ईश्वरीय मार्ग से जोड़ा हैं। ऐसे ही एक अलौकिक अवतार गुरू श्री नानक देव हैं। कहा जाता हैं कि श्री गुरू नानक देव का आगमन ऐसे युग में हुआ, जो इस देश के इतिहास के सबसे अंधेरे युगों में था। उनका जन्म 1449 में लाहौर से 30 मील दूर दक्षिण-पश्चिम में तलवंडी रायभोय नामक स्थान पर हुआ जो इस समय पाकिस्तान में हैं। आगे जाकर गुरूदेव के सम्मान में इस स्थान का नाम ‘ननकाना साहिब’ रखा गया। श्री गुरू नानक देव संत, कवि व समाज सुधारक थे। धर्म काफी समय से थोथी रस्मों और रीति-रिवाजों का नाम बनकर रह गया था। उत्तरी भारत के लिए यह कुशासन और अफरा-तफरी का समय था। सामाजिक जीवन में भारी भ्रष्टाचार था और धार्मिक क्षेत्र में द्वेष और कशमकश का दौर था। न केवल हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच में ही, बल्कि दोनों बड़े धर्मों के भिन्न-भिन्न संप्रदायों के बीच भी। इन कारणो से भिन्न-भिन्न संप्रदायों में और भी कट्टरता व बैर-विरोध की भावना पैदा हो चुकी थी। उस वक्त समाज की हालत वाकई बदत्तर थी।

ब्राह्मणवाद ने अपना एकाधिकार बना रखा था। उसका परिणाम यह था कि गैर- ब्राह्मण को वेद शास्त्राध्ययन से हतोत्साहित किया जाने लगा। निम्न जाति के लोगों को इन्हें पढऩा बिल्कुल वर्जित था। इस ऊंच-नीच का गुरू श्री नानक देव अपनी मुखवाणी जपुजी साहिब में कहते हैं कि ‘नानक उत्तम-नीच न कोई..’ जिसका भावार्थ हैं कि ईश्वर की निगाह में छोटा-बड़ा कोई नहीं फिर भी अगर कोई व्यक्ति अपने आपकों उस प्रभु की निगाह में छोटा समझे तो ईश्वर उस व्यक्ति के हर समय साथ हैं। यह तभी हो सकता हैं जब व्यक्ति ईश्वर के नाम द्वारा अपना अहंकार दूर कर लेता हैं। तब व्यक्ति ईश्वर की निगाह में सबसे बड़ा हैं और उसके समान कोई नहीं। गुरू श्री नानक देव की वाणी में-नीचा अंदर नीच जात, नीची हूं अति नीच। नानक तिन के संगी साथ, वडियां सिऊ कियां रीस? समाज में समानता का नारा देने के लिए उन्होंने कहा कि ईश्वर हमारा पिता हैं और हम सब उसके बच्चे हैं। पिता की निगाह में कोई छोटा अथवा बड़ा नहीं होता। वहीं हमें पैदा करता हैं और हमारे पेट भरने के लिए खाना भेजता हैं। नानक जंत उपाइके, संभालै सभनाह। जिन करते करना कीआ, चिंताभिकरणी ताहर? जब हम एक पिता एकस के वारिस बन जाते हैं तो पिता की निगाह में जात-पात का सवाल ही नहीं पैदा होता।

श्री गुरू नानक देव जात-पात का विरोध करते थे। उन्होंंने समाज को बताया कि मानव जाति तो एक ही हैं फिर यह जाति के कारण ऊंच-नीच क्यों? श्री गुरू नानक देव ने कहा कि मनुष्य की जाति न पूछो, जब व्यक्ति ईश्वर की दरगाह में जाएगा तो वहां जाति नहीं पूछी जाएगी। सिर्फ आपके कर्म ही देखे जाएंगे। श्री गुरू नानक देव ने पित्तर-पूजा, तंत्र-मंत्र और छुआ-छूत की भी आलोचना की। इस प्रकार हम देखते हैं कि श्री गुरू नानक साहिब हिन्दू और मुसलमानों में एक सेतु के समान हैं। हिन्दू उन्हें गुरू एवं मुसलमान पीर के रूप में मानते हैं। उन्होंने हमेशा ऊंच-नीच और जाति-पांति का विरोध करने वाले श्री गुरू नानक देव ने सबको समान समझकर गुरू का लंगर शुरू किया, जो एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करने की प्रथा हैं। श्री गुरू नानक देव महत्वपूर्ण व गंभीर संदेश आमजन को बेहद साधारण तरीके से दे देते थे। उन्होंने एक बार महज एक सुई के माध्यम से एक रईस इंसान को अपनी गलती का अहसास करा दिया। श्री गुरू नानक देव बहुत दयालु और हिम्मती होने के साथ ही हमेशा मुस्कराते रहने वाले महापुरूष थे।

Thursday, 26 November 2015

महाभारत काल का साक्षी ‘भाद्राजून’

घनश्याम डी रामावत
राजस्थान के अनेक प्राचीन/अति-प्राचीन दुर्ग, महल व स्मारक, वक्त के थपेड़ों को सहते-सहते.. या तो काल कवलित हो चुके हैं अथवा आज अपने अस्तित्व को बचाये रखने की जद्दोजहद में जुटे हुए हैं। इन सब के बीच कुछ ऐसे दुर्ग एवं महल भी हैं जिनके शासकों द्वारा समय-समय पर संरक्षण व सुरक्षा के साथ जीर्णोद्वार के प्रयास किए जाने से वे आज भी अपने मूल स्वरूप के लगभग अक्षुण बनाये हुए हैं। राजस्थान के ऐसे ही ऐतिहासिक तथा प्राचीन स्थलों में से एक हैं ‘भाद्राजून’। भाद्राजून एक छोटा सा गांव हैं, जो यहां के इतिहास, दुर्ग व महल के कारण अपनी एक अलग पहचान रखता हैं। पश्चिमी राजस्थान के जालोर जिले में यह प्राचीन स्थल लूणी नदी के बेसिन पर स्थित हैं। भाद्राजून पिछली शताब्दियों में हुए अनेक युद्धों व ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी रहा हैं। मारवाड़ राजवंश तथा मुगल साम्राज्य के शासकों के बीच यहां अनेक बाद युद्ध तथ आक्रमण हुए। यहां के शासकों की एक लम्बी फेहरिस्त हैं जिन्होंने मारवाड़ के जोधपुर राजघराने के अधीन रहकर शासन चलाया और क्षेत्र की समृद्धि के लिए व प्रजा की रक्षा के लिए काम किया।
‘भाद्राजून’ का सीधा संबंध महाभारत काल से हैं। इस लिहाज से इसकी उत्पति पांच हजार वर्ष पुरानी मानी जाती हैं। ‘भाद्राजून’.. दो शब्दों-सुभद्रा व अर्जुन को मिलाकर बना हैं। सुभद्रा भगवान श्रीकृष्ण की बहन थी तथा अर्जुन पाण्डु पुत्र थे। प्रारम्भ में यह स्थान ‘सुभद्रा-अर्जुन’ के नाम से जाना जाता था, लेकिन कालान्तर में इसमें धीरे-धीरे परिवर्तन हो गया और बोलचाल की भाषा में इसे ‘भाद्राजून’ के नाम से पुकारा जाने लगा। ‘सुभद्रा-अर्जुन’ अर्थात आज का ‘भाद्राजून’ ग्राम की बसावट पांच हजार वर्ष पुरानी मानी जाती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार द्वापर युग में महाभारत का युद्ध हुआ था, अत: इसका सीधा ताल्लुक महाभारत काल से हैं। उस समय का महान योद्धा पाण्डु पुत्र धनुर्धर ‘अर्जुन’ भगवान श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा के प्रेम में आबद्ध हो गया था। उन दिनों पाण्डव वनवास पर थे, इस दौरान पांचों पाण्डु पुत्रों को बारह वर्षों तक जंगलों में व एक वर्ष अज्ञातवास में रहना था। ‘सुभद्रा-अर्जुन’ का प्रसंग भी उस वक्त का ही हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन व अपनी बहन सुभद्रा को गुजरात के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल ‘द्वारिका’ जाने का परामर्श दिया। दोनों ने प्रस्थान किया तथा लगातार तीन दिन और रात चलने के बाद वे लूणी नदी के बेसिन पर बनी इस घाटी पर पहुंचे, जहां आज ‘भाद्राजून’ गांव स्थित हैं।

उस स्थान का नाम शंखबाली पड़ गया
उन दिनों यहां किसी तरह की कोई बसावट नहीं थी अर्थात कोई नहीं रहता था। यहीं कारण था कि यह स्थान सुभद्रा और अर्जुन के लिए विश्राम करने हेतु एकांत व सुरक्षित था। यहीं पर उन्होंने एक मंदिर के पुजारी की मदद से विवाह किया। कहते हैं उसके बाद ही धीरे-धीरे इस घाटी में अन्य लोगों ने भी बसना शुरू किया और इस स्थान का नाम ‘सुभद्रा-अर्जुन’ हो गया जिसे बाद में ‘भाद्राजून’ के नाम से जाना जाने लगा। सुभद्रा-अर्जुन के विवाह की रस्म पुरी करने वाले पुजारी(पुरोहित) को अर्जुन ने एक शंख तथा सुभद्रा ने अपने नाक की बाली खोलकर भेंट स्वरूप प्रदान की। इसके पश्चात् पुरोहित द्वारा जिस स्थान पर विवाह की रस्म अदा कराई गई उस स्थान/गांव का नाम शंखबाली पड़ गया जो आज भी विद्यमान हैं। यहां पहाड़ी के पीछे सुभद्रा देवी का प्राचीन मंदिर भी हैं जिसे ‘धुमदामाता मंदिर’ के नाम से जाना जाता हैं।

ऐतिहासिक दृष्टि से ‘भाद्राजून’ का महत्व
 ‘भाद्राजून’ दुर्ग महल पर वर्तमान में भाद्राजून के शासकों की 17वीं पीढ़ी का स्वामित्व हैं। इनके पूर्वज ठाकुर रतनसिंह जो जोधपुर के महाराज राव मालदेव के चौथे पुत्र थे, सन् 1549 में यहां आये थे। अंतत: भाद्राजून रियासत सन् 1652 में महाराजा जोधपुर के अधीन आई। ‘भाद्राजून’ उस समय जोधपुर राज्य के दस बड़े ठिकानों में गिना जाता था। जोधपुर महाराजा और नागरिकों द्वारा यहां के ठिकाने व शासकों को पूरा आदर-सम्मान दिया जाता था। ऐसा ही आदर-सम्मान इस रियासत के राज परिवार से संबद्ध महिलाओं को भी मिलता था। अन्य रियासतों की तरह इस रियासत को भी न्यायिक शक्तियां मिली हुई थी। ये किसी भी अपराधी को अधिकतम छ: माह के लिए जेल में रहने की सजा सुना सकते थे। इनकी अपनी पुलिस व्यवस्था और जेल खाने भी थे। जोधपुर के राठौड़ों के अधीन आने से पूर्व ‘भाद्राजून’ परिहार राजपूतों, भाटी, सोनगरा, सिंहल राठौड़ तथा मण्डावर राठौड़ राजपूतों के अधीन भी रहा था। यहां के शासकों ने सामाजिक उत्थान व विकास से संबंधित अनेक कल्याणकारी गतिविधियां अपने समय में संचालित की। यहां के शासक परिवार में से स्वर्गीय राजा गोपालसिंह राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष रह चुके हैं।

‘भाद्राजून’ के भव्य दुर्ग एवं महल
‘भाद्राजून’ दुर्ग का निर्माण सोलहवीं शताब्दी में एक पहाड़ पर किया गया जो छोटा हैं किन्तु सामरिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण, मजबूत व सुरक्षित हैं। यह दुर्ग घोड़े के पैर(खुर) के आकार की घाटी से जुड़ा हुआ हैं जिसमें एक ही तरफ पूर्व दिशा से प्रवेश किया जा सकता हैं। दुर्ग की दीवार लगभग 20-30 फीट ऊंची तथा उसकी एक समान चौड़ाई दस फीट की हैं। दुर्ग की प्राचीर में अनेक बुर्जे बनी हुई हैं जिनका उपयोग युद्धकाल में तोप, बन्दूक व तीर चलाने में किया जाता था। चारों ओर पहाडिय़ां व घाटियां होने से दुर्ग को अत्यधिक प्राकृतिक सुरक्षा मिली हुई थी। सामरिक दृष्टि से सुरक्षित इस दुर्ग की अकबर के सेनापतियों द्वारा प्रशंसा की गई थी(ऐसा इतिहासकार बताते हैं)। अकबर की सेना जोधपुर के राव चंद्रसेन के समय यहां से गुजरी थी। दुर्ग पर अनेक प्राचीन अवशेष आज भी दिखाई पड़ते हैं। यहां तत्कालीन ठाकुर बख्तावरसिंह ने एक पक्का जलाशय बनवाया था जिसे आज ‘बख्तावर सागर’ के नाम से जाना जाता हैं।

समुद्र तट से इस दुर्ग की औसत ऊंचाई दो हजार फीट हैं। जिस उबड़-खाबड़ पथरीली पहाड़ी पर यह दुर्ग बना हुआ हैं उस पर अनेक पेड़, पौधे, वनस्पति, झाडिय़ां व चट्टानें हैं। दुर्ग के चारो ओर के जंगल में अनेक जंगली जीव विचरण करते देखे जा सकते हैं। राज परिवार का निवास स्थल, जिसे यहां की भाषा में रावला कहते हैं.. हेरीटेज होटल में परिवर्तित किया जा चुका हैं। यहां वर्ष भर देशी-विदेशी पयर्टक आते हैं जिन्हें जीप सफारी द्वारा ‘भाद्राजून’ के ग्रामीण परिवेश का अवलोकन कराया जाता हैं तथा जंगल की सैर भी कराई जाती हैं। ‘भाद्राजून’ महल में चौदह सुसज्जित कक्ष हैं जिनमें प्रमुख हैं शीष महल, गोपाल महल, हवा महल और गुमटा महल। अनेक कक्षों की दीवारों पर सुन्दर चित्रकारी एवं कांच का काम किया हुआ हैं। आकर्षक झाली-झरोखों युक्त महल का स्थापत्य देखते ही बनता हैं। इसमें ऐतिहासिक व प्राचीन साजो-सामान भी संग्रहित हैं। महल की एक खासियत यह भी हैं कि सूर्योदय की पहली किरण सभी कक्षों में सीधी पहुंचती हैं। ‘भाद्राजून’ ग्राम के बाहरी भाग में राजा-महाराजाओं की कलात्मक छतरियां बनी हुई हैं जिन्हें ‘देवल’ कहते हैं।

जालोर जिला मुख्यालय से 54 किलोमीटर
राजस्थान में जालोर जिला मुख्यालय से ‘भाद्राजून’ 54 किलोमीटर दूर, जालोर-जोधपुर मार्ग पर स्थित हैं। यह जोधपुर से 97 किमी, उदयपुर से 200 किमी, जयपुर से 356 किमी एवं दिल्ली से 618 किमी हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन जालोर तथा पाली हैं जो यहां से लगभग पचास किमी की समान दूरी पर हैं। निकटतम हवाई अड्डा जोधपुर में हैं।

Wednesday, 25 November 2015

जोधपुर स्थित उम्मेद उद्यान शिवालय: मौनी बाबा का साधना केन्द्र

घनश्याम डी रामावत
मौनी बाबा की अपनी पचास वर्षों की मौन साधना का केन्द्र एवं तपोस्थली रहा ‘उम्मेद उद्यान स्थित शिवालय’, जोधपुर के प्रमुख शिवालयों में से एक माना जाता हैं। वर्ष 1946 में पहाड़ीनुमा छोटे चबूतरे पर बने शिवालय के पास मौनी बाबा ने अपनी आराधना की शुरूआत की। सूर्यनगरी(जोधपुर) के कुछ श्रद्धालुओं ने बारिश व धूप में साधना करते देख मौनी बाबा के लिए एक छोटी-सी कुटियां का निर्माण करवाया। धीरे-धीरे लोगों की आस्था बढ़ती गई और यह छोटा सा शिवालय श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख आस्था स्थल बन गया। वर्ष 1989 में भारत मन्दिर हरिद्वार के संस्थापक व निवृत शंकराचार्य स्वामी सत्यमित्रानंद के सानिध्य में शिव विग्रहों की प्राण प्रतिष्ठा की गई। मन्दिर के सत्संग सभागार में मां अम्बे, गिर्राजधरण, बालाजी मंदिर तथा राम दरबार भी जन-जन की आस्था के प्रमुख केन्द्र हैं।

शिवालय में मौनी कृपा देव दर्शन सभागार
जोधपुर स्थित उम्मेद उद्यान के शिवालय में मौनी कृपा दर्शन सभागार भी हैं। इसमें भगवान सत्यनारायण, राधाकृष्ण, मां सरस्वती, मां संतोषी, विष्णु लक्ष्मी, लोक देवता बाबा रामदेव, साई बाबा, भगवान झूलेलाल, भक्त शिरोमणि मीरा बांई और दत्तात्रेय की प्रतिमाएं प्रमुख हैं। मन्दिर से सटे सत्संग भवन सभागार में कपिल मुनि, सती अनसूया, मानस रचयिता गोस्वामी तुलसीदास, ऋषि विश्वामित्र, देवर्षि नारद, सांदीपनी, पितामह भीष्म, सूतजी, अंगिराजी, ऋषि वशिष्ठ एवं वेदव्यास जैसे प्रमुख ऋषि मुनियों की प्रतिमाएं भी विद्यमान हैं। वर्ष 1966 में ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी, संवत् 2053/23 मई 1996 को मौनी कृपा देव दर्शन सभागार का शुभारम्भ खेड़ापा रामस्नेही पीठ के पीठाचार्य पुरूषोत्तमदास द्वारा किया गया। सभागार के शुभारम्भ के कुछ माह पूर्व ही 4 फरवरी 1996 को मौनी बाबा ब्रह्मलीन हो गए। ब्रह्मलीन होने के बाद श्रद्धालु भक्तों की ओर से सभागार में मौनी बाबा की प्रतिमा स्थापित की गई। वर्ष 2007 में तपोस्थली को संत कुटीर में तब्दील कर दिया गया।

विरक्त मौनी बाबा का संक्षिप्त परिचय
जन-जन की श्रद्धा व आस्था के केन्द्र विरक्त मौनी बाबा का सांसारिक नाम ‘रामसेवक दास’ था। शिव मन्दिर भूमि पर दशकों तक तपस्या के दौरान मौनी बाबा ‘मौन’ ही रहे। मौनी बाबा कहां से आए, यह आज भी किसी को ज्ञात नहीं हैं। मन्दिर से ताल्लुक रखने वाले कुछ बुजुर्ग श्रद्धालुओं की मानें तो मौनी बाबा उत्तर प्रदेश में राजकीय सेवा में थे एवं उन्हें सेवा में रहते ही वैराग्य की अनुभूति होने पर सब कुछ छोड़ कर निकल गए। जोधपुर उम्मेद उद्यान स्थित शिव मंदिर में रात्रि विश्राम के बाद सवेरे रवाना होते वक्त अचानक काले सर्प के दर्शन के बाद(कथित रूप से उनका मार्ग रोके जाने के पश्चात्) उसी स्थान पर उन्होंने मौन साधना शुरू की जो अनवरत पचास वर्षों तक जारी रही(इससे पूर्व जैसा कि उनके भक्त व जानने वाले बताते हैं मौनी बाबा कहीं भी एक स्थान पर नहीं ठहरते थे अर्थात रात्रि विश्राम के बाद अगले दिन सवेरे अन्य गंतव्य की ओर प्रस्थान करना ही उनकी जीवन शैली थी)।

साधना के दौरान उन्हें यदि कुछ आवश्यक वस्तु की जरूरत होती तो वे स्लेट पर लिखकर अपने भक्तों से संवाद करते थे। उम्र के साथ उनके स्वास्थ्य में गिरावट के चलते एक अगस्त 1992 को परिव्राजकाचार्य स्वामी ईश्वरानंदगिरी(संत सरोवर-आबू पर्वत) उम्मेद उद्यान मन्दिर पहुंचे और मौनी बाबा से उनके मौनी व्रत का पारणा करवाया। मौनी बाबा ने मन्दिर के विकास के लिए वर्ष 1985 में शिवजी महाराज ट्रस्ट की स्थापना की, जिसमें कानसिंह परिहार, सतीशचंद्र गोयल, ओ पी पुरी, शरद मूंदड़ा व धर्मीचंद पंवार क्रमश: अध्यक्ष रहे। वर्तमान में सम्पतराज परिहार श्री शिवजी मंदिर ट्रस्ट मंडल/पब्लिक पार्क(शिवालय) के अध्यक्ष हैं। स्वरूपसिंह भाटी सचिव, रामचंद्र बोराणा व्यवस्थापक तथा अनिल टेवानी कोषाध्यक्ष हैं।

प्रतिवर्ष श्रावण मास में मेले का आयोजन
जोधपुर उम्मेद उद्यान स्थित शिव मन्दिर प्रांगण में प्रतिवर्ष श्रावण सोमवार को मेले का आयोजन किया जाता हैं। मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। मन्दिर संचालन समिति(श्री शिवजी मंदिर ट्रस्ट मंडल/पब्लिक पार्क) के अनुसार शिवरात्रि, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, नवरात्रा, मौनी महाराज वर्षी उत्सव व माघ पूर्णिमा के अवसरों पर विशेष झांकियों के साथ सत्संग का आयोजन किया जाता हैं। शिव मन्दिर ट्रस्ट की ओर से प्रत्येक गुरू पूर्णिमा को आम भण्डारे का आयोजन भी होता हैं। मन्दिर परिसर में पक्षियों के लिए विशाल चुग्गा देने की व्यवस्था भी हैं।

Monday, 23 November 2015

जैसलमेर: थार मरूस्थल का सुनहरा मुकुट/एक स्वर्णिम कल्पना

घनश्याम डी रामावत
जैसलमेर भारत के राजस्थान राज्य का एक शहर है। भारत के सुदूर पश्चिम में स्थित धार के मरुस्थल में जैसलमेर की स्थापना भारतीय इतिहास के मध्यकाल के प्रारंभ में 1156 ई. के लगभग यदुवंशी भाटी के वंशज रावल-जैसल द्वारा की गई थी। रावल जैसल के वंशजों ने यहां भारत के गणतंत्र में परिवर्तन होने तक बिना वंश क्रम को भंग किए हुए 770 वर्ष सतत् शासन किया, जो अपने आप में एक महत्वपूर्ण घटना हैं। जैसलमेर राज्य ने भारत के इतिहास के कई कालों को देखा व सहा हैं। सल्तनत काल के लगभग 300 वर्ष के इतिहास में गुजरता हुआ यह राज्य मुगल साम्राज्य में भी लगभग 300 वर्षों तक अपने अस्तित्व को बनाए रखने में सक्षम रहा। भारत में अंग्रेजी राज्य की स्थापना से लेकर समाप्ति तक भी इस राज्य ने अपने वंश गौरव व महत्व को यथावत रखा। भारत की स्वतंत्रता के पश्चात यह भारतीय गणतंत्र में विलीन हो गया। भारतीय गणतंत्र के विलीनकरण के समय इसका भौगोलिक क्षेत्रफल 16,062 वर्ग मील के विस्तृत भू-भाग पर फैला हुआ था। रेगिस्तान की विषम परिस्थितियों में स्थित होने के कारण यहाँ की जनसंख्या बींसवीं सदी के प्रारंभ में मात्र 76,255 थी। जैसलमेर जिले का भू-भाग प्राचीन काल में ’माडधरा’ अथवा ’वल्लभमण्डल’ के नाम से प्रसिद्ध था। महाभारत के युद्ध के बाद बड़ी संख्या में यादव इस ओर अग्रसर हुए व यहां आ कर बस गये।
यहां अनेक सुंदर हवेलियां और जैन मंदिरों के समूह हैं जो 12वीं से 15वीं शताब्दी के बीच बनाए गए थे। सही मायने में जैसलमेर राजस्थान का सबसे ख़ूबसूरत शहर हैं और यहीं कारण हैं कि इसे पर्यटन के लिहाज से सबसे आकर्षक स्थल माना जाता हैं। जैसलमेर का गौरवशाली दुर्ग ‘सोनार किला’ त्रिभुजाकार पहाड़ी पर स्थित हैं। इसकी सुरक्षा के लिए इसके चारों ओर परकोटे पर तीस-तीस फीट ऊंची 99 बुर्जियां बनी हैं। चूंकि यह किला और इसमें स्थित सैंकड आवासीय भवन पीले पत्थरों से बने हुए हैं, सूर्य की रोशनी में स्वर्णिम आभा बिखेरते हैं .. इसी वजह से इसे सोनार किला/गोल्डन फोर्ट के नाम से पुकारा जाता हैं।  जैसलमेर का यह किला दुनिया के सर्वश्रेष्ठ रेगिस्तानी किलों में से एक हैं। सुबह जब सूर्य की अरुण चमकीली किरणें जब इस दुर्ग पर पड़ती हैं तो बालू मिट्टी के रंग-परावर्तन से यह किला पीले रंग से दमक उठता हैं। शहर के हर कोण से दिखाई देने वाला यह किला रेत में आ गिरे किसी स्वर्ण मुकुट सा लगता हैं। पीले सेन्ड स्टोन से बने इस किले में चार विशाल दरवाजों से होकर प्रवेश किया जाता हैं जिन्हें पोल कहा जाता हैं।

गोपा चौक स्थित किले का प्रथम प्रवेश द्वार
जैसलमेर के किले का मुख्य आकर्षण तो गोपा चौक स्थित किले का प्रथम प्रवेश द्वार ही हैं। यह विशाल और भव्य द्वार पत्थर पर की गई नक्काशी का शानदार नमूना है। अपने स्थापत्य से यह द्वार आने वालों को कुछ देर के लिए ठिठका देता हैं। दूसरा आकर्षण दुर्ग के अंतिम द्वार हावड़पोल के पास स्थित दशहरा चौक हैं जो इस दुर्ग का खास दर्शनीय स्थल है। यहां पर्यटक खरीददारी का आनंद ले सकते हैं और थोड़ विश्राम कर सकते हैं। दशहरा चौक में स्थानीय शिल्प और हस्तकला की बेहद खूबसूरत वस्तुओं की छोटी छोटी दुकानें हैं जिनपर कांच जड़े वस्त्र, चादरें, फ्रेम और कई अन्य कलात्मक वस्तुएं खरीदी जा सकती हैं। हावड़पोल के बाहर की ओर भी कई दुकानें स्थित हैं।

अंदरूनी हिस्से में बना राजमहल आकर्षण का केन्द्र
जैसलमेर किले में एक अन्य पर्यटन आकर्षण है राजमहल। यह महल किले के अंदरूनी हिस्से में बना हुआ हैं। किसी समय यह महल जैसलमेर के राजा महाराजाओं के निवास का मुख्य स्थल हुआ करता था। इस वजह से यह दुर्ग का सबसे खूबसूरत हिस्सा भी हैं। वर्तमान में इस महल के एक हिस्से को म्यूजियम और हैरिटेज सेंटर के रूप में तब्दील कर दिया गया हैं। म्यूजियम में प्रवेश शुल्क हैं। यह म्यूजियम अप्रैल से अक्टूबर तक सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक पर्यटकों के देखने के लिए खोला जाता हैं। इसके अलावा नवंबर से मार्च तक इसे सुबह 9 से शाम 6 बजे तक के लिए रोजाना खोला जाता हैं। इस रेतीले शहर में एक झील भी है घडीसर लेक। किले से बाहर अमरसागर गेट के पास एक सुंदर महल स्थित हैं बादल विलास मंदिर, यह स्थापत्य कला का अनूठा उपहार हैं। जैसलमेर चाहे एक छोटा शहर सही लेकिन अपने आस-पास कई सुन्दर पर्यटक की रूचि के स्थान सहेजे हैं। जैसलमेर से 17 कि.मी. दूर अकाल में स्थित वुड फॉसिल पार्क में अठारह करोड़ वर्ष पुराने जीवाश्म देखे जा सकते हैं जो कि इस क्षैत्र के भूगर्भीय अतीत के गवाह हैं।

पीले पत्थर पर बारीक कारीगरी से युक्त जैन मंदिर
दुर्ग के आकर्षणों में सात जैन मंदिर भी शामिल हैं जो दुर्ग में यत्र-तत्र बने हुए हैं। पीले पत्थर पर बारीक कारीगरी से युक्त इन मंदिरों का स्थापत्य देखते ही बनता हैं। ये सभी मंदिर लगभग 15 वीं से 16 वीं सदी के बीच बनाए गए थे। इन मंदिरों में सबसे भव्य मंदिर जैन धर्म के 22 वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ को समर्पित है। पार्श्वनाथ मंदिर के अलावा चंद्रप्रभु मंदिर, रिषभदेव मंदिर, संभवनाथ मंदिर आदि भी दुर्ग परिसर में बने अन्य भव्य मंदिरों में शुमार किये जाते हैं।  पर्यटकों को यहां ज्ञान भंडार के दर्शन करने की भी सलाह दी जाती है। जहां एक भव्य ऐतिहासिक लाइब्रेरी बनी हुई है। इस लाइब्रेरी का निर्माण सोलहवीं सदी में किया गया था। लाइब्रेरी में कई हस्तलिखित पांडुलिपियां भी आकर्षण का बड़ा केंद्र हैं। ये सभी मंदिर दशहरा चौक के दक्षिण पश्चिम में 150 मीटर के दायरे में बने हुए हैं। पर्यटकों से प्रत्येक मंदिर में दर्शन करने का चार्ज अलग से लिया जाता है। यह शुल्क बहुत मामूली सा है। पर्यटकों के लिए ये मंदिर रोजाना सुबह 8 से दोपहर 12 बजे तक खुलते हैं।

सम के रेतीले टीले (सेन्ड डयून्स)
हवा की दिशा के साथ अपनी जगह और दिशा बदलते ये रेतीले टीले(सेन्ड डयून्स) पूरी दुनिया के पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र हैं। यहां का सूर्यास्त बेहद मनमोहक और एकदम अलग किस्म का होता हैं। कहावत हैं सूर्य से बडा कोई चित्रकार नहीं, तो यहां सम में सूर्य ने अलग ही कोई तूलिका और अलग ही कोई कैनवास लिया हैं। मीलों तक फैले इस रेतीले विस्तार को सजीले ऊंटों पर बैठ कर नापा जा सकता हंै। चांदनी रात में सम में ही ढाणियों(छोटी-छोटी झोंपडिय़ों का समूह) में ठहर कर चांदनी रात, कालबेलिया नृत्य, राजस्थानी लोक गीतों तथा राजस्थानी भोजन दाल-बाटी-चूरमा का आनंद लिया जा सकता हंै। सम की ढ़ाणी नामक यह स्थान जैसलमेर से 42 कि.मी. दूर हैं।

कैमल सफारी के लिये डेर्जट नेशनल पार्क
कैमल सफारी के लिये वाकई यह एक उत्तम जगह हैं। इस पार्क का बीस प्रतिशत हिस्सा रेतीला हैं। उबड़-खाबड़ जमीन के परिदृश्य में अपनी जगह बदलते रेतीले टीलों और छोटी छोटी झाडिय़ों से भरी पहाडिय़ों वाला यह डेर्जट नेशनल पार्क रेगिस्तानी पारिस्थितकीय तन्त्र(इको सिस्टम) के मनमोहक रूप को दर्शाता हैं। इन सबके बीच खारे पानी की छोटी-छोटी झीलें चिंकारा और ब्लैक बक के रहने के लिए आरामदेह पारिस्थिति बनाती हैं। यहां डेर्जट फॉक्स, बंगाल फॉक्स, भेडिये(वुल्फ) और डेर्जट कैट भी देखने को मिल जाती हैं। रेगिस्तानी वन्य जीवन को करीब से जानने के लिये यह एक उपयुक्त स्थान हैं। इस नेशनल पार्क में विविध प्रकार के पक्षी अपनी अलग ही छटा बिखेरते हुए यदा-कदा दिखाई दे जाते हैं, जिनमें मुख्य हैं-सेन्ड ग्राउज, पॉट्रिज(तीतर), लार्क, श्राइक और बी इटर आदि।

सर्दियों में यहां डेमॉइजल क्रेन डेरा डालते हैं, जिन्हें यहां की लोक-भाषा में ‘कुरज’ कहते हैं तथा यहां के लोकगीतों में ‘कुरज’ को बड़े स्नेह से शामिल किया गया हैं। सबसे महत्वपूर्ण जीव जो अपनी भव्यता के साथ इस डेर्जट नेशनल पार्क का स्थाई निवासी हैंवह हैं गोडावण(ग्रेट इन्डियन बर्स्टड) यह एक बड़ा और लम्बा पक्षी हैं, यह राजस्थान का राज्य पक्षी भी हैं। यह नेशनल पार्क सरिसृपों से भी भरा हैं। यहां स्पाइनी टेल्ड लिर्जड़, मॉनिटर लिर्जड़, सॉ स्केल्ड वाइपर, रसल वाइपर तथा करैत आदि सरिसृप मिलते हैं।

समृद्ध संस्कृति से ओत-प्रोत मेले और उत्सव
मेले और उत्सव राजस्थान की समृद्ध संस्कृति के जीवंत उदाहरण हैं। सर्दियों में त्यौहार और मेलों के साथ यह क्षेत्र सचमुच जीवंत हो उठता हैं। प्रमुख आकर्षण का केन्द्र हैं यहां का मरू-मेला(डेर्जट फेस्टीवल), इस मेले के लिए विश्व भर के पर्यटक इस स्वर्ण-नगरी में चले आते हैं। उस समय यहां के गेस्टहाउस और होटल ही नहीं लोगों के घर भी जाने-अनजाने अतिथियों से भर जाते हैं। सचमुच उस वक्त ‘अतिथि देवो भव:’ की परंपरा इस गीत में साकार हो उठती हैं-‘पधारो म्हारे देश...’। तब जैसलमेर थिरक उठता हैं..घूमर, गणगौर, गैर, धाप, मोरिया, चारी और तेराताल जैसे नृत्यों के साथ। इन नृत्यों को ताल देते हैं यहां के लोक वाद्य कामयाचा, सारंगी, अलगोजा, मटका, जलतरंग, नाद, खड़ताल और सतारा।

लंगा और मंगनियार गवैयों की टोली लोकगीतों का अद्भुत/मनमोहक समां बांध देती हैं। यहां मरू उत्सव फरवरी माह में पूर्णिमा के दो दिन पहले शुरू होता हैं। इस दौरान यहां कई प्रकार की प्रतियोगिताएं  आयोजित की जाती हैं जैसे ऊंट रेस, पगडी बांधो, मरूसुंदरी, नृत्य, और ऊंट पोलो इत्यादि। इस दौरान यहां की कारीगरी के उत्कृष्ट नमूनों का प्रदर्शन तथा बिक्री भी की जाती हैं। जैसे खेजड़े की लकड़ी का नक्काशीदार फर्नीचर, ऊंट की काठी के स्टूल व कठपुतलियां आदि। इस मेले का चरमबिन्दु होता हैं ‘सम सेन्ड ड्यून्स’ जाकर वहां फिर पूरे चांद की रात में नृत्य-संगीत की मनोरम प्रस्तुति।

जोधपुर से 280 किमी की दूरी पर
राजस्थान के सुदूर पश्चिमी कोने में बसा यह रेगिस्तानी शहर जैसलमेर जोधपुर से 280 किमी की दूरी पर है। सोनार किला जैसलमेर रेल्वे स्टेशन से मात्र तीन किमी और बस स्टैंड से 2 किमी की दूरी पर है। रेल्वे स्टेशन या फिर बस स्टैंड से सोनार किले तक जाने के लिए ऑटो की सुविधा मौजूद  हैं। किले और जैसलमेर के अन्य पर्यटन स्थलों के लिए एक टैक्सी भी किराए पर ली जा सकती हैं। खास बात यह कि जब भी सोनार किला देखने का मन करे.. अपना कैमरा साथ रखना न भूलें।

Sunday, 22 November 2015

सुख-समृद्धि के साथ मंगल कामना की प्रतीक ‘रंगोली’

घनश्याम डी रामावत
प्राय: उत्सवों/त्यौहारों के समय किसी के घर के बाहर विभिन्न रंगों से बनी डिजाइन देखकर हम विचार में पड़ जाते हैं कि यह आखिर क्यों बनाई गई हैं? त्यौहारों के समय में और खासकर दीपावली के समय में घर का लीपने-पोतने का, सजाने-संवारने का कार्य किया जाता हैं। आधुनिक समय में दीवारों को सजाने का कार्य पेंटिग्स, पोट्रेट ने ले लिया हैं, वहीं घर के बाहर बनी-बनाई रंगोली के स्टीकर भी अब बाजार में मिलने लगे हैं। कई स्थानों पर तो रंगोली बनाने के लिए विभिन्न डिजाइन के साधन भी मिलने लगे हैं। जिसमें चावल का आटा भर कर जमीन पर चलाना मात्र होता हैं। ग्रामीण परिवेश अभी भी आधुनिकता से अछूता हैं। वहां, घर के बाहर की दीवारों पर, आंगन में व मुख्य द्वार के बाहर अनेक रंगों की अद्भुत रंगोली देखने को मिल जाती हैं। अन्याय पर न्याय की जीत के पर्व दीपावली पर रंगोली सजाकर स्त्रियां संपूर्ण वातावरण को वाकई रंग-बिरंगा बना देती हैं। यह रंगोली प्रसन्नता का विषय हैं कि आधुनिक और पढ़ी-लिखी स्त्रियों में भी के प्रति गहरा आकर्षण दिखाई देता हैं।
रंगोली सामाजिक जीवन का एक बहुत ही अभिन्न अंग हैं। देश के अनेक हिस्सों में रंगोली सजाने का अपना अलग-अलग अंदाज हैं और अपना-अपना अलग महत्व भी। दक्षिण भारत में स्त्रियां प्रात:काल जल्दी उठते ही अपने-अपने घरों के मुख्य द्वारों को विभिन्न रंगों की रंगोली से सजाती हैं। उत्तर भारत में रंगोली को अल्पना या चौक पूरना भी कहा जाता हैं। त्यौहार/उत्सव तो जैसे रंगोली के बिना अधूरे ही लगते हैं। प्रतीकोपासना हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। यही कारण हैं कि प्राचीन काल से अब तक इष्ट प्राप्ति और अनिष्ट परिहार के लिए विविध प्रतीकों के पूजन की प्रथा अनवरत रूप से प्रचलित हैं। मौजूदा पाश्चात्य प्रभाव की पर्याप्त पैठ शहरों में होने के कारण हमारे लोक संस्कृति के प्रतीक शहरी इलाकों की अपेक्षा गांवों में अधिक लोकप्रिय हैं, जिन्हें हम रंगोली, अल्पना, चौक पूरना, मांडणे मांडना, कोलम व साथिया आदि नामों से पुकारते हैं। इन प्रतीकों में असीम आस्था, श्रद्धा तथा कल्याण की कामना समाई हुई हैं। तभी तो पर्व/त्यौहारों, सांस्कृतिक समारोहों व मांगलिक अवसरों पर उक्त प्रतीक बनाए जाने की लोक परम्परा और प्रचलन हैं।

रंगोली/अल्पना के बारे में पौराणिक कथा

रंगोली के बारे में एक पौराणिक कथा भी प्रचलित हैं। एक बार भगवान शिव ने हिमालय की ओर प्रस्थान करते हुए माता पार्वती से कहा कि जब मैं लौटू, तुम्हारा घर-आंगन जगमगाता हुआ मिलना चाहिए.. अन्यथा मैं पुन: हिमालय लौट जाऊंगा। भगवान शिव तो चले गए, पर माता पार्वती चिंता में पड़ गई। उन्होंने घर को झाड़ा-बुहारा फिर गाय के गोबर से लीपा। घर सूख भी न पाया था कि भगवान शिव ने अपनी वापसी की सूचना की आवाज लगा दी। पार्वती जी हड़बड़ा कर दौड़ी और उनका पांव गीले आंगन में फिसल गया। भगवान शिव ने देखा तो चकित रह गए। पार्वती के पांवों की कलात्मक छाप, पांवों में लगे हुए महावार के लाल रंग का अंकन तथा उस पर गिरे हुए फूल.. सब एक मनोरम दृश्य उत्पन्न कर रहे थे। इस रंगीन आकृति पर प्रसन्न होकर भगवान शिव ने वरदान दिया कि आज से जिन घरों में यह रंगोली सजाई जाएगी, वहां शिव का वास होगा। घर-आंगन, धन-धान्य से भरा रहेगा और तभी से घरों में रंगोली बनाने की प्रथा चल पड़ी।

मांगलिक प्रतीक कल्याण की कामना के द्योतक
अल्पना-अलंकरण अत्यधिक पुराना प्रतीत होता हैं, क्योंकि पुरातत्वीय खोजों से जो सामग्री प्राप्त हुई हैं उसमें अद्भुत रेखांकन देखने को मिले हैं। विशेषज्ञों का इस विषय में मत हैं कि ये रेखांकन, जो प्राय: अल्पना में पाए जाते हैं.. वे भगवान शिव के प्रतीक हैं तथा अद्र्धवृत का प्रयोग आदि शक्ति के प्रतीक हैं। इस प्रकार शिव-शक्ति के प्रतीक रूप में अल्पना/रंगोली का अंकन हमारे देश के एक छोर से दूसरे छोर तक मांगलिक अवसरों पर अवश्य किया जाता हैं। विशेष अवसरों पर उकेरे जाने वाले ये मांगलिक प्रतीक कल्याण की कामना के द्योतक हैं। प्रत्येक घर में इनके बनाने, उकेरने का दायित्व प्राय: महिलाओं पर रहता हैं। इसकी महत्ता के बारे में मान्यता है कि बिना इन अलंकरणों के घर कल्याणकारी/मंगलकारी नहीं प्रतीत होता। मांगलिक अवसरों पर घर में बनाए जाने वाले चित्रांकन प्राय: कुंवारी कन्याओं अथवा स्त्रियों द्वारा किए जाते हैं, जिसमें रंगोली/मांडने/अल्पना.. अपने-अपने क्षेत्रों के अनुसार उकेरे जाते हैं। शुरूआत में गाय के गोबर से उस स्थान को लीपा जाता हैं, फिर सींक, सलाई, रूई, ब्रश अथवा उंगली की मदद से रंगोली/अल्पना/लोक चित्रकारी बनाने का कार्य किया जाता हैं।

भगवान शिव और शक्ति के समन्वय की कल्पना
अधिकांशत: लक्ष्मी, कमल का फूल, स्वास्तिक, चिडिय़ां, हाथी, शेर, मोर व फूल बड़ी श्रद्धा के साथ बनाए जाते हैं। यहीं नहीं, गांवों में तो जो लोक गीत इस अवसर पर गाए जाते हैं, उन्हें सुनकर श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। इन चित्रांकनों एवं गीतों में लोकमंगल के इतने भाव भर दिये जाते हैं कि भारतीय संस्कृति मानो स्तोत्रवाहिनी के रूप में प्रवाहित होने लगती हैं। इनमें जो विविध आकृतियां उकेरी जाती हैं, उनके प्रति असीम भक्ति-भावना का भाव उड़ेला जाता हैं जिसे विशेष नजरों से ही परखा जा सकता हैं। अल्पना आलेखन में नारी हृदय की कोमल भावनाओं का जो भाव उड़ेला जाता हैं उसकी उत्कृष्टता को आंकना आसान नहीं हैं। भगवान शिव और शक्ति के समन्वय की कल्पना को अल्पना में आड़ी-तिरछी रेखाओं और अद्र्धवृतों में साकार करने की परम्परा भी हैं। उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों में जहां पाश्चात्य प्रभाव नहीं पड़ा हैं, वहां चौक पूरने की प्रथा हैं जो रंगोली/अल्पना आदि का ही रूप हैं। अनुष्ठान किए जाने वाले स्थान को पहले गाय के गोबर से लीपते हैं, उसके बाद सूप में गेहूं, जौ अथवा चावल(जो सुलभ हो) का आटा लेकर बड़ी आकर्षक आकृति का चौक पूरा जाता हैं, जिसमें उंगलियों के सहारे आड़ी-तिरछी रेखाओं से मांगलिक प्रतीक बनाए जाते हैं।

लोक संस्कृति की अमूल्य धरोहर
रंगोली बनाने की शुरूआत प्राय: वर्षा ऋतु खत्म होते ही होने लगती हैं। आसमान के साफ होते ही लोग कीड़े-मकोड़ों को नष्ट करने के लिए घरों की सफाई शुरू कर देते हैं। घरों की सफाई के बाद घर-आंगन रंगोली/अल्पना के लिए तैयार हो जाता हैं। स्त्रियां रोली, कुमकुम, फल, पीसे हुए चावल, रंग, लकड़ी का बुरादा, भूसी, चोकर व आटा इत्यादि वस्तुओं से जमीन पर रंगोली बनाती हैं। भगवान की पूजा के समय सबसे पहले चौक पूरने की प्रथा भी रंगोली का ही रूप हैं। स्त्रियां स्वास्तिक के चिन्ह को अंकित करना शुभ मानती हैं। स्वास्तिक चार भुजाओं का प्रतीक हैं। ये चार रेखाएं आश्रम, वर्ग, वेद और पुरूषार्थ का प्रतीक हैं। स्वास्तिक के अलावा कलश, कतल, पुष्प, मछली, पक्षी, हाथी व शंख तारा इत्यादि का अंकन करने के पीछे सुख, समृद्धि तथा ऐश्वर्य की कामना परिलक्षित होती हैं। लक्ष्मी तथा श्रीगणेश का अंकन भी इसी भावना का प्रतीक हैं। रंगोली हमारी लोक संस्कृति की एक अमूल्य धरोहर हैं।

रामचरित मानस में खास तरीके से उल्लेख

आज यह सिर्फ हमारे पूजाघरों तक सीमित नहीं हैं। पारिवारिक उत्सवों में स्त्रियां बड़े उत्साह से सुस्वागतम् की शुरूआत करके हर कमरे तथा कोने में रंगोली/अल्पना सजाती हैं। दीपावली के पर्व पर भी दीप और कलश को अलंकृत करके तथा घरों व पूजा के थाल में रंगोली सजाकर स्त्रियां संपूर्ण वातावरण को रंग-बिरंगा बना देती हैं। रामचरित मानस में इसका उल्लेख कुछ इस रूप में किया गया हैं-‘चौकें चारू सुमित्रां पूरी। मनिमय विविध भांति अति रूरी।।’ तथा लोक गीत में भी कहा गया हैं-‘घर बीच चउक पुराइला, देव बइठाइला हो।’ अर्थात घर में चौक पूर कर मांगलिक कार्य के शुभारम्भ हेतु देव-स्थापना कर सर्वांगीण विकास की कामना की जाती हैं। वास्तव में ग्रामीण जीवन का भोला-भाला, सरल-सीधा निष्कलुष स्वरूप इन सबसे झलकता हैं कि कितनी निश्छल निर्मल भावनाएं इन विविध उपास्य प्रतीकों में उभारी जाती हैं, उकेरी जाती हैं, उड़ेली जाती हैं, जिनका गुणगान करते-करते मन नहीं अघाता और देखते जी नहीं भरता।


आज के फैलते दूषित व वातावरण से ग्रामीण जीवन की ये निर्मल भावनाएं झुलस न जाएं, मलिन न हो जाएं, अत: इस ओर अत्यधिक सतर्कता एवं सावधानी बरतने की आवश्यकता हैं। लेकिन फिर भी यह प्रसन्नता की बात हैं कि आधुनिक और पढ़ी-लिखी स्त्रियों का रंगोली के प्रति आज भी गहरा आकर्षण दिखाई पड़ता हैं।

Saturday, 21 November 2015

राजस्थान कांग्रेस: गहलोत-पायलट में अघोषित ‘पॉवर वार’!

घनश्याम डी रामावत
ललित मोदी प्रकरण में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का नाम आने के अलावा बिहार चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की करारी हार ने राजस्थान कांग्रेस को सचमुच जीवन दान दे दिया हैं। प्रदेश कांग्रेस के नेताओं ने इसे भाजपा की घटती साख मानते हुए अभी से राजस्थान में अगली सरकार अपनी पार्टी की बनने के मंसूबे पाल लिए हैं। संभवत: इसी उम्मीद में प्रदेश के दो बड़े नेताओं पीसीसी अध्यक्ष सचिन पायलट और पूर्व सीएम अशोक गहलोत के बीच अप्रत्यक्ष रूप से सीएम पद को लेकर अघोषित ‘पावर वॉर’ छिड़ गया हैं। दरअसल दो बार सीएम रह चुके गहलोत अभी भी राजस्थान की सक्रिय राजनीति में ही रहना चाहते हैं, जबकि कांग्रेस आलाकमान सचिन पायलट को फ्री हैंड देने और नई लीडरशिप खड़ी करने के लिए गहलोत को दिल्ली बुलाना चाह रहा हैं। पायलट कैंप ने आलाकमान के सामने दलील दी हैं कि राजस्थान में अति सक्रियता दिखा रहे गहलोत को दिल्ली बुलाकर उनके लंबे अनुभव का कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर फायदा उठाना चाहिए।

सूत्रों की मानें तो पंजाब, हरियाणा के बाद अब राजस्थान कांग्रेस में बढ़ती कोल्ड वॉर से चिंतित अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांगे्रस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने हाल ही में गहलोत को पायलट को पूरा सहयोग देने और केंद्रीय राजनीति में आने का बोला है, लेकिन गहलोत दिल्ली नहीं जाना चाहते। उनके कैंप के नेताओं ने राहुल को यह समझाने की कोशिश की हैं कि गहलोत की राजस्थान में दिनोंदिन बढ़ती लोकप्रियता और जनमानस के बीच साफ छवि का फायदा उठाने के लिए कांग्रेस को उन्हें सदन में नेता प्रतिपक्ष बनाकर भाजपा सरकार के खिलाफ आक्रमण की धार तेज करनी चाहिए। बहरहाल, कांग्रेस संगठन में दबे पांव बढ़ते विवाद के साथ ही गहलोत और पायलट के दिल्ली के दौरे भी बढ़ गए हैं। राजस्थान के गांधी के तौर पर प्रदेश में अपनी खास छवि रखने वाले अशोक गहलोत की अतिसक्रियता के चलते भी पायलट खेमा चिंतित हैं। 

गहलोत खेमे की चिंता, दिल्ली गए तो राजस्थान में होंगे कमजोर
अति-विश्वसनीय तरीके से छन कर आ रही खबरों को माने तो अशोक गहलोत समथकों को चिंता हैं कि अगर वे दिल्ली चले गए तो राजस्थान में कमजोर होते जाएंगे और तीन साल बाद पायलट ही सीएम पद के लिए पार्टी का चेहरा हो जाएंगे। इसी कारण गहलोत पिछले दिनों से राहुल कैंप के नेताओं से लगातार दिल्ली में मुलाकात करके यह समझाने में जुटे हैं कि उनका राजस्थान में सक्रिय रहना पार्टी के लिए ज्यादा फायदेमंद हैं। गहलोत कैंप चाहता हैं कि वसुंधरा सरकार को भ्रष्टाचार समेत विभिन्न मुद्दों पर पटकनी देने के लिए अनुभवी गहलोत को नेता प्रतिपक्ष बनाया जाए, ताकि पीसीसी अध्यक्ष पायलट को भी सहूलियत हो और कांग्रेस संगठन मजबूत हो सके। सियासी चर्चा तो यह भी हैं कि पायलट को दिल्ली में कमजोर करने के लिए इन दिनों पुराने राजनीतिक प्रतिद्वंदी अशोक गहलोत, डॉ. सी पी जोशी और जितेंद्र सिंह के बीच नजदीकियां बढ़ गई हैं।

राजस्थान में कांग्रेस को फिर से सत्ता में लाने के लिए राहुल गांधी बिहार चुनाव से पहले और बाद में प्रदेश के प्रमुख नेताओं के साथ लंबी गोपनीय मीटिंग कर चुके हैं। पूर्व पीडब्ल्यूडी मंत्री और हाड़ौती के दिग्गज नेता प्रमोद जैन भाया, मेवाड़ से पूर्व सांसद रघुवीर मीणा, अजमेर संभाग से पूर्व मुख्य सचेतक एवं वरिष्ठ नेता रघु शर्मा, जयपुर से पूर्व विधायक प्रताप सिंह खाचरियावास और शेखावाटी से कांग्रेस विधायक गोविंद डोटासरा, बीकानेर संभाग से पूर्व शिक्षामंत्री मास्टर भंवरलाल मेघवाल को बुलाकर प्रत्येक से डेढ़-डेढ़ घंटे का इंटरव्यू लिया गया हैं। इनसे दूसरे राज्यों से आए नेताओं के साथ ग्रुप और अकेले में भी चर्चा की गई। कथित गहलोत-पायलट टकराव को लेकर भी राहुल ने बातचीत की।

बातचीत के दौरान एक नेता ने राहुल गांधी को समझाया कि सरकार बनने की जो संभावना दिल्ली में बैठे आपको दिखाई दे रही हैं, ग्राउंड लेवल पर ऐसा नहीं हैं। जबकि पांच में से तीन नेताओं ने कहा कि अशोक गहलोत को राजस्थान से बाहर करके कांग्रेस को दुबारा खड़ा करना संभव नहीं हैं। सूत्रों की मानें तो अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांगे्रस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष राहुल गांधी अपनी नई संभावित टीम बनाने के लिए ही शीघ्र ही सभी राज्यों के नेताओं से बुलाकर उनका विचार जानने वाले हैं।

जितेंद्र सिंह बन सकते हैं महासचिव
राजस्थान से अभी कांग्रेस में डॉ. सी पी जोशी और मोहन प्रकाश राष्ट्रीय महासचिव हैं, जबकि बाड़मेर के पूर्व सांसद हरीश चौधरी, आदिवासी नेता ताराचंद भगौरा और अल्पसंख्यक नेता जुबेर खान राष्ट्रीय सचिव हैं। हालांकि मोहन प्रकाश, भगौरा और जुबेर खान को नई टीम में जगह मिलने की संभावना कम नजर रही हैं। सी पी जोशी को भी अपना पद बचाए रखने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ रही हैं, क्योंकि दिल्ली की पूर्व सीएम शीला दीक्षित को महत्वपूर्ण भूमिका में लाने की संभावना हैं। धौलपुर के मोहन प्रकाश की जगह पूर्व केंद्रीय मंत्री और राहुल के करीबी अलवर के पूर्व सांसद जितेंद्र सिंह को महासचिव बनाया जाना तय माना जा रहा हैं।

वैसे तो संभावना न के बराबर हैं फिर भी अगर गहलोत को दबाव बनाकर दिल्ली लाया गया, तो उनको राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष या वे नहीं माने, तो महासचिव का पद भी दिया जा सकता हैं। राष्ट्रीय सचिव हरीश चौधरी के पंजाब में सह प्रभारी रहने के दौरान ठीक से काम करने की वजह से उनको फिर से मौका मिलने की संभावना हैं। राजस्थान के प्रभारी और राष्ट्रीय महासचिव गुरुदास कामत की जगह राजस्थान में नया प्रभारी लगाए जाने की भी संभावना हैं। असल में महाराष्ट्र से सुशील कुमार शिंदे को कामत की जगह पर महासचिव बनाने की चर्चा हैं। ऐसे में कोई अति-श्योक्ति नहीं कि राजस्थान कांग्रेस को जल्दी ही नया प्रभारी मिल जाए।

सोनिया-राहुल के सामने गहलोत जिन्दाबाद के नारे
अभी हाल पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के 98वें जन्मदिन पर युवक कांग्रेस की ओर से नई दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू ऑडिटोरियम में मां तुझे सलाम रखा गया। कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी, वरिष्ठ उपाध्यक्ष राहुल गांधी व पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मौजूदगी में हुए इस कार्यक्रम में राजस्थान प्रदेश के तीन वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं के अलावा बड़ी तादाद में युवा नेता मौजूद थे। कार्यक्रम में राजस्थान के  नेताओं को पूरी तवज्जों मिली। पूर्व सीएम अशोक गहलोत, राष्ट्रीय महासचिव सी पी जोशी व प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट ने कार्यक्रम में अपना संबोधन दिया। यहां पर वरिष्ठ नेता गहलोत के अपने खास कद व प्रभाव ने आलाकमान को हैरत में डाल दिया। गहलोत जैसे ही उद्बोधन के लिए खड़े हुए सभागार में बैठे युवाओं ने उनके पक्ष में जमकर जिंदाबाद के नारे लगाए तथा गर्मजोशी से अभिनन्दन किया। निश्चित रूप से यह स्थिति गहलोत के समर्थकों के उस दावे की एक तरह से पुष्टि ही करती हैं कि गहलोत के बिना राजस्थान में कांग्रेस का पुन: खड़ा हो पाना शायद संभव नहीं।